Thursday, 18 August 2011

वो,रोज़ आता रहा,सपनों में,मेरे

वो,रोज़ आता रहा,सपनों में,मेरे
पूछता रहा,चाहिये और क्या तुझे
                         हर बार कहती रही--------------
                         अभी एक सपना और तो देख लूं
फिर,आ जाना कभी----------
जब,सपना मेरा चुक जाएगा,तो कह दूंगी तुम्हें
                   वो,मुस्करा कर,दबे पांव उठ गया
                   और,मैं लेटी रही,मुदीं पलकों में,सपने लिये .               

                                            मन के-मनके


8 comments:

  1. वाह!! बहुत गहरी एवं सुन्दर अभिव्यक्ति!!

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. सपने देखना और उन्हे पूरा करना, इसी में जीवन निकल जायेगा।

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. वाह!! सीधी सादी भाषा में गहन अभिव्यक्ति....
    सादर बधाई...

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  6. बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति | आभार |

    मेरी नई रचना जरुर देखें |अच्छा लगे तो ब्लॉग को फोलो भी कर लें |

    मेरी कविता: उम्मीद

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