Saturday, 24 June 2017

’जहां मैं हूं— वहां विरोधाभास है— मैं ही तो--- विरोधाभास हूं—’



                    शुभप्रभात मित्रों,
                   सुबह-सुबह ही लिख पाती हूं,
                   कुछ कह पाती हूं-
                   ’कोटेज एंड केफ़े’ एक संकलन
                   हिंदी कविताओं का,’ अनुराग’ की बातें-
                   दिल की बातें—
                   एक कविता चुनी है-
                   ’विरोधाभास’—
                   ’बदलाव मैं चाहता हूं
                    पर,किसी को बदलना नही
                 ----
                     जैसे कोई सूरज को चाहे
                     जलना नहीं--
                    
                     और—
                     ’जहां मैं हूं---
                     मैं विरोधाभास ही तो,
                     मैं ही हूं--इसलिये कि,
                     विरोधाभास
                               
                          सरलता से कही गयी, गहरी बात!!
                           वैसे तो जीवन से लेकर मृत्यु तक-
                           सुबह से लेकर शाम तलक-
                           हर बात से लकर हर बात तलक-
                           विरोधाभास की छांव-धूप बिखरी हुई है.
                           कही जीवन की कुलबुलाहट तो कहीं
                          म्रूत्यु का क्रंदन,आंसुओं के सैलाब तो
                          मुस्कुराहटों के इंद्रधनुष—
                         यही है जीवन—और यहीं हैं हम!
                         थोडे से शब्दों में,बगैर छंद-तुक में बंधे
                        अपनी बात कह दी—और
                        एक बात कह दी, जो सभी की है.
                        ’जहां मैं हूं—
                         वहां विरोधाभास है—
                          मैं ही तो---
                          विरोधाभास हूं—’
                                  सुंदर!!!
 े
 अनुराग गुप्ता: केेफ़े एंड कोटेज,एक संकल हिंदी कविताओं का.

Monday, 17 April 2017

आज का अखबार और दो खबर-




सुबह की बेला हो,सूरज आपकी बलकनी ने पहुंच गया हो,चिडियों की चहचहाट
सुन पा रहे हों और चाय का मग आपकी उंगलियों में फंसा हो-
और,अखबार से नजरें चुरा कर चाय की चुस्कियां चल रही हों?
यदि, ऐसा हो रहा हो तो समझिये आप सुकून में हैं.
हां,जिंदगी को कुछ देर बाद भागना ही है,रोज का काम है.
दो खबरों ने मैंने हृदय की वीना के तार छेड दिये-
यह मुहावरा अक्सर खुशी जारिह करने के लिये प्रयोग किया जाता है,हिंदी जगत में,लेकिन मुझे कुछ समझ नही आ रहा कि इन परिस्थितियों में किस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाय?
पहली खबर—मोदी जी ने कहा-हर दिन मुझसे कोई ना कोई नाराज हो जाता है.
सूरत में मल्टी स्पेशअलिटी अस्पताल का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा,१८-४-२०१७ को.
बात छोटी सी है मगर गहरी है-जहां उम्मीदें हों और उन उम्मीदों को पूरा करने वाला भी हो(मोदी जी से उम्मीदें हम सब को हैं--)तो लाजमी है-शिकायतें बनी रहना-कभी खत्म ना होना-जब तक सांस है-आस है!
तो,मोदी जी आप परेशान ना हों-हमारा सौभाग्य कि सालों बाद, आजादी के बाद-कोई तो मिला कि नजरें उठा लें और कोई समझ ले,हमे.
लेकिन, ये उम्मीदों का सिलसिला ठहरने वाला नहीं है-सांस है,जब-तक आस बंधी ही रहेगी.
दूसरी खबर-हमारे शहर में अच्छे तबके में रहने वाले एक सज्जन ने पहले पत्नि की हत्या की बाद में खुद को भी फांसी लगा ली-एक नोट लिख कर चले गये कि इस कृत्य के लिये वे ही जिम्मेवार हैं.
एक घर जहां संयुक्त परिवार रहता है-दिन दहाडे इतनी बडी घटना घट जाय और बगल के कमरे में भनक भी ना पडे--??
बात कहने-सुनने की नहीं है,समझने की है,कि हम भीड में भी नितांत हैं?
इतनी आवाजें हैं बाहर की कि खुद की आवाज सुनाई नहीं पडती कि कोई अंद्रर बैठा घुप अंधेरे में,चीख रहा है,छटपटा रहा है कि मुझे बाहर निकालो कि मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं उम्मीदों व सपनों के ढेर में-और कोई सुन नहीं पा रहा है-और एक दिन वह सब सींकचों को टेढा कर के बाहर निकल आता है—
और-खुद को आजाद कर देता है??
मगर यह आजादी कैसी एक कैद से निकल कर दूसरी कैद में स्वम अपने आप को डाल देना जहां मुक्ति नहीं है,छटपटाह है-फिर वह चीखेगा-मुझे बाहर निकालो,मुझे बाहर निकालो!!
आइये-
अपने-आप से बात करते हैं-
१.हम सपनों के साथ जन्म लेते हैं.
२.सपने या उम्मीदें या आकांक्षाएं- सब एक ही मनोभाव के रूप हैं,
झीनी सी चादर ह बीच में.
३.सपने जरूरी है चलने के लिये रोशनी की किरण,
कभी-कभी यह किरण रास्ता भी दिखाती है,कभी, भ्रम है मरुद्धान का,रेगिस्तान में,पहचान इसकी है,जरूरी?
४.हर सपने को पूरा होने के लिये वक्त का इंतजार और हर स्वप्न पूरे होने की दरकार नहीं रखते,जरूरी नहीं.
कहीं हम पूरा कर पाते हैं-कहीं आस्तित्व की मर्जी,क्या करें?
५.छोटे-छोटे सपने जो पूरे हो गये उन्हें अनुगृहित हो कर एनलार्ज कर लें!!
६.अपने-आप को छोटी-छोटी आजादी देते रहिए-
सुबह की धूप में,रात की खिली-खिली चांदनी में,नदी के तट पर बैठ कर,
कभी नांव में बैठ कर,नांव खेनी आती हो, कभी नौका-विहार करके यूं ही , कभी-कभी मनीप्लांट की पत्तियों को छूकर---जो बलकनी में यूं ही फैल रही है,
बिन मांगे!
७-और-रोज ये लाइनें दुहराइये नहीं गुनगुनाइये
ये जिंदगी फिर ना मिलेगी दुबारा!
और,दुनिया यूं ही चलती रहेगी,हम हों ना हों!!
धन्यवाद:


Friday, 17 February 2017

ठगी के तरीके



ठगी के तरीके
दोस्तों’ठगी’ शब्द से हम सभी भली-भांति परिचित हैं.
इतिहास गवाह है-बनारस के ’ठग’.
पूरा अंग्रेजी तंत्र परेशान था-इस तंत्र को उखाडने में.
इतिहास के जानकारों ने इस अध्याय को भली-भांति
पढा होगा और इतिहास के क्षात्रों ने इस अध्याय को रट्टा लगा कर तैयार किया होगा-
लेकिन किस्सा मजेदार है,ठगी का-मुझे हमेशा पसंद आया.
यह कहना कठिन है-कि इस अध्याय से परीक्षा में कितने प्रश्न फंसे.
लेकिन आप और हम यह ना समझे –यह किस्सा यहीं खत्म हो गया या कि अंग्रेज इस किस्से के खात्मा करने में सफल ही हो गये,नहीं जी.
कहते हैं ना-कोई भी किस्सा समूल नष्ट नहीं होता वक्त के साथ-उग आता है-अपनी नयी टहनियों के साथ.
एक किस्सा इसी किस्से से निकला और हम उसमें ठग ही गये.
आज कल गरीब लडकियों की शादियों में सहयोगी बनने का सगूफ़ा खूब प्रचलित है—
इसके कई कारण हो सकते हैं—
हम अभी भी उम्मीद लगाये हैं कि मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा सो गरीब लडकियों की शादी में ५ हजार दे कर स्वर्ग में अपनी सीट बुक करवा लेते हैं-एडवांस बुकिंग.
एक कारण यह भी हो सकता है—हमारी नई-नई अमीरी को कोई नजर भर देख तो ले,कम से कम.
एक कारण यह भी हो सकता है—
कि रुपये को चालाय मान करते रहें.
शायद मेरा अनुमान गलत भी हो सकता है,क्षमा करें.
अब कल ही बात है-ऐसी ही एक शादी में जाना हुआ,हालांकि उस शादी में जाना ना ही मेरा कर्ज था और ना ही मेरा फ़र्ज.
मेरी परिचिता ने गरीब कन्या की शादी में ५ हजार देकर स्वर्ग में अपनी सीट बुक करा ली थी-उनकी मेहरबानी थी जो हमें भी साथ लगा लिया-एक कहानी याद हो आपको-एरावत की पूंछ पकड कर स्वर्ग जाने की.
लेकिन मार हमें झेलनी पडी गाडी हमारी,पेत्रोल हमारा ड्राइवर की दहाडी हमारी-हमने सोचा कि सौदा मंहगा नहीं है-यदि स्वर्ग देख कर ही लौट आएं-क्या हर्ज है-
फ़र्क क्या पडता है-यदि एरावत की जगह चार-पाई हो-मेरा मतलब गड्डी हो-जमाना बदल गया है-बदल रहा है-जी

चूंकि ५ हजार तो गरीब कन्या के पिता के काले बेग में चले ही गये सो वे तो निंश्चित थे-हमें लग रहा था कि स्वर्ग जाने से पहले दावत ही चख ली जाय तो क्या बुरा है-मुंह मीठा हो जाय.
और,वहां गरीब कन्या के पिता को जैसे-तैसे ढूंढ कर निकाला गया-और उनकी नीयत का फैलाव फैलता ही जा रहा था-कन्या के सामने ले जा कर खडा कर दिया—और हम चेत गये-और लिफाफों की दरकार से.
सो,वहां से भाग खडे हुए-बहुत हुआ,स्वर्ग का लालच.
पहले इस दुनिया को तो भुगत लें.
हद हो गयी एक गोलगप्पा भी नसीब नहीं हुआ-
और साहिब हम से बडा लालची भी आपने कोई और देखा नहीं होगा-चले गये स्वर्ग पाने-पांच हजार में?
खैर,अकल तो अनुभवों से ही आती है.
एक बात और-गरीब कन्याएं पैदा ही क्यों की जाती हैं?
यह २१वीं सदी की ठगी है?
ध्यान रखियेगा खुद मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता,
और, गरीब कन्या की शादी कराने से भी स्वर्ग नहीं मिलता.
स्वर्ग तो एरावत हाथी से दूर रहने से मिल सकता है-
शायद?
धन्यवाद: