Monday, 23 January 2017

जब पाना शेष हो जाय,तब जो शेष रह जाय,उसे सहेजिये,नमस्कार मित्रों:




 जब पाना शेष हो जाय,तब जो शेष रह जाय,उसे सहेजिये,नमस्कार मित्रों:

अर्सा गुजर गया-’मन के-मनके’ से रूबरू हुए.
कारण कुछ नहीं था बस,कुछ कहना होता है,और,
कह दिया,फ़र्क नहीं पडता कौन सुन रहा है?
कल ही कुछ कहा था-
“जब पाना शेष हो जाय,तो जो शेष रह जाय,उसे सहजिये.”
आइये इसी को कहती हूं इस अंदाज से—
देखिये,उम्र के साथ-साथ हमारी यादास्त भी बढती रहनी चाहिये,
वर्ना खाली-खाली सा लगने लगता है.
एक बात और जरूरी है—
यादों को खूबसूरत बनाने की समझ भी बढती रहनी चाहिये,अन्यथा
यही यादें जीना हराम भी कर देती हैं.
दो यादों को याद कर रही हूं और आप के साथ शेअर भी कर रही हूं.
बस,वक्त बहुत है-यही वक्त कम हो जाता था-वक्त वक्त की बात है.
पहली याद—
चुनावों की-
क्योंकि चुनाव का मौसम आ गया है,सो चुनाव के मौसम में चुनावों की यादों को याद कर लिया जाय.
बात उन दिनों की जब देश नया-नया आजाद हुआ था और नयी नयी मिली थी आजादी अपनी सरकार बनाने की.
अंग्रेज अभी भी देश में मौजूद थे-सही है २०० साल की रिहाइश के बाद कम से कम ५-१० साल तो लगते ही हैं-बोरिया-बिस्तर समेटने में.
प्रत्याशी घर-घर जाते थे,हाथों को जोडे-और घर-घर रिश्तों को भी निभाते थे-पैर छू कर,गले लगा कर,छोटे बच्चों को गोदी में उठा कर.
उस समय लगता था-हम कर्णधार हैं-हम नैया पार लगा सकते हैं-
बडे-बडे धुंरंधरों की.
ना कोई झंडा ना कोई डंडा,बस पीछे-पीछे भीड बच्चों की,कुछ अपनों की-बाकी तो तमाशबीन ही होते थे-ऐसा तमाशा जो सदियों के बाद देखने को मिला था.
वोट डालने वाले दिन की तो छटा निराली थी.
भोर सुबह से घर-घर तैयारियां होती थीं—औरतें ऐसे सजती थीं कि बस कहा ही नही जा सकता शब्दों में.
बच्चों की चिल्ल्पों,बुजुर्गों की डांट-फटकार-जवानों का जोश देखने के लायक होता था—
कितनी पढाई होती थी कई दिनों तक चलती रहती थी-कि,पर्ची कैसे मोडी जाय,कि पर्ची कैसे डाली जाय,कि पर्ची किस डिब्बे में डाली जाय-
और कितनी पर्चियां विरोधी के डिब्बे में डल ही जाती थीं,और घर आकर कितनी फटकारों का सामना करना होता था.
क्या किया जा सकता था-मुआ घूंघट कुछ देखने दे तब ना?
और,कितने गीतों की रचना हो जाती थी-प्रचलित गीतों की तर्ज पर कि,
वोट वाले भैया,बडे सुघड
वोट वाले चाचा कितने चतुर
वोट वाले बेटा बुढापे की डोर—
अब क्या है भैया--?
वोट वाले बडे ढोल की पोल??
बात वही होती है,बस वक्त का तकाजा बदल जाता है.
जल्दी ही दूसरी याद को शेअर करूंगी, जल्दी ही.

Tuesday, 1 November 2016

Don’t transfer the cow’s load to the bull.





Don’t transfer the cow’s load to the bull.
मुल्ला नसरुद्दीन बादशाह के दरबार में,बादशाह को कोई किस्सा सुना रहे थे.
किस्सा ऐसा कि बादशाह को कुछ समझ ना आया,
वाकई-किस्सा, किस्सा भी ना था सिवाय बे-फिजूली के- सो,बादशाह ने एक झापड रसीदी कर दी-मुल्ला की ओर.
बेचारा-नसरुद्दीन क्या करता?
गुस्सा तो उसे भी बहुत आया कि इतने जतन से एक किस्सा गढा था-और उसका हश्र यह हुआ.
बादशाह पर तो अपना गुस्सा निकाल नहीं सकता था,
पीछे खडे सख्श के गाल पर एक चांटा रसीद कर दिया.
वह सक्श भी समझ नहीं पाया कि यह माजरा क्या है?
मुल्ला से पूछा—यह चांटा क्यों मारा?
मुल्ला ने कहा--इसके बाबत बात में बात करेंगे अभी तो तू भी पलट कर एक चांटा रसीद कर दे-अपने पास खडे आदमी को.
ओशो कहते हैं—
हम सभी यही कर रहे हैं-इस संसार में.
अपने क्रोध,ग्लानि,द्वेश,-विद्वेश,घृणा को दूसरों के ऊपर फेंके जा रहे हैं-
बगैर यह जाने कि इनके कारण क्या हैं?
इनका प्रतिफलन क्यों हो रहा है?
यदि, यही जान लें तो जीवन से सभी प्रकार की नकारत्मकता चली जाय.
रोज मर्रा के जीवन में यही तमाशा चल रहा है-
बास के द्वारा प्रताडित व्यक्ति घर आकर पत्नि को प्रताडित करता है-
पत्नि प्रताडित हो कर बच्चों को प्रताडित कर देती है-
और-बेचारे बच्चे कहां जाय क्योंकि आज वे खुद पिट कर आए हैं-स्कूल से.
सो,वे अपने कमरे में जाकर अपने खिलोनों को तोडने लगते हैं.
बात कहां से चली और कहां पहुंची?
आइये—
खोजे अपने गुस्से को.
जाने अपने-आप को.


Sunday, 18 September 2016

The Combo Plan Of The Existence


                         

The Combo Plan Of The Existence
Desires and longings
Wishes and prayers
Conscious and Intentions
Are the waves—
On the current of the Time and Space.
Karmas—created—
Created Karmas-
Sow the seed of Karmas-
And—
Pushes and pulls are ways of the Existence-
Existence works with-law of physics--Vow!! 
Give us—two choices—always,
Meant to pick one-at a time,
Otherwise we know-we fall down??
Friends:
An echo, ever-ever is there--
Some times,-audible faintly-but
Most of the times—it is,
audible,clearly!!
So,never be in despair.
Accept His Plan with gratitude.
He is the best Planner and,
The best—Judge-
He never fails to deliver our dues.
Good or bad???
Love you all-so much.

Monday, 12 September 2016

एक घरोंदा प्यार का-




एक घरोंदा प्यार का—
    मैंने भी यूं नही बनाया
    खिलोने तो और भी—
    बहुत थे--
    खेलने के लिये—
   इसको खिलोना समझ—
खरीदा भी नहीं था—
छीना भी नहीं था,किसी और से
यह एक बहाना भी नहीं था—
खुद से-किसी और से भी नहीं
मेरे वज़ूद से कतरा-कतरा होते रहे
दिन-रात मेरे---
हर-एक सपने मेरे—
सपनों को ईंट की तरह-
चिनती रही—
इंतजारी गारे में घोल कर
बे-खबर थी---
सपने तो सपने ही होते हैं
कुछ और होते नहीं
कल किसी को कहते सुना था-कि
सुबह की होन में-एक सपना
बन चांद का टुकडा—
आ गिरा—
आंगन के फर्श पर-
और—गोद में यूं बिखर गया,कि
चांदनी बिखर गयी हो,जैसे-
आंगन के फर्श पर—
मैंने भी सोचा—चाहा भी
सपनों की ईंटों को चिन-चिन
इंतजारी गारे में घोल कर
एक घरोंदा मैं भी बना लूं
फिर,उस सपनों को-
सुबह की होन में
खुली आंखो से मैं भी देख लूं
और—
एक घरोंदा प्यार का
टूटे नहीं—
बहानों के झूठ में,और
प्यार का घरोंदा—
जमुनाई आसुओं के किनारे
ताजमहल सा—
संगमर्मरी हो जाय-
हर आस बिखरती रहे
मैं,जमुनाई आसुंओं के किनारे बैठ कर
इंतजार करती रही—
ताज के खडे होने का—
और—
ताज के गढने के लिये--
एक शाहेजहां कहां था?
मुमताज तो दफन थी
कब्र में—
झरोखों से झांकता
शाहेजहां पहले से ही लिपटा हुआ था,
ना-उमीदों के कफन में--
एक घरोंदा प्यार का-
मैंने भी यूं नहीं बनाया था.