Thursday, 18 August 2016

अब मेरे पास सपनों के अलावा और शायद,कुछ और नहीं है




शुभप्रभात मित्रों—आपका दिन मंगलमय हो,और कल बधीं राखियों की डोर अभी ढीली ना हुई हो—ऐसी कामना के साथ:
आज कह रही हूं-कुछ अंदाजे बयां और में—कृपया कुछ तो कहा करिये??
अब मेरे पास सपनों के अलावा और शायद,कुछ और नहीं है
साल-दर-साल गुजर गये-पीडाओं को उम्मीदों की डोर में,सपनों को पिरोते-पिरोते—
कभी कागजी-चिंदियों पर बे-बात की लकीरे खींचती रही,
कभी,उम्मीदों के तीर पर बैठी-कागजी नाव को खैती रही,
कभी,सपनों की कश्ती को सूखे पानी पर भिगोती रही,
कभी,किसी मित्र को कहती रही—मित्र,तुम चटक मत जाना,और,
वहां चटकन के अलावा कुछ शेष और ना था,
कभी चटकती धूप में इंद्रधनुष के चटकने का इंतजार था,मुझे
हाहाहा—-
कभी ऐसा भी भला हो सकता है—पागल थी मैं,
कभी गुनगुनाती रही—मेहराबों पर लटके बंदनवार सिमट जाते हैं--
बारात गुजर जाने के बाद—समेटने ही होते हैं--??
कभी पतझड की पाती पर-प्रेम की पाती लिखती रही थी मैं---
हा-हा—हा—पागल थी मैं.
और,अब जाना सालो-सालों बाद—
यह हाला है-
यह प्याला है—
यह माधुशाला है—
यह जीवन की मधुशाला है-
नशे-नशे में फ़र्क नहीं-
फ़र्क है तो असर नहीं-
-------------------------???
जब होश ना हो अपनों का-
जब गम ना हो बेगानों का-
अपनों से दूर छिटक-
गैरों का हाथ पकड—
जब थामा हो जाम—
सपनों का—
नशा तो बस नशा है.
अभी भी—बिखरे हैं,स्वर्ग—चारों तरफ.

Thursday, 28 July 2016

शुभप्रभात,मित्रों.बात आज के अखबार की.



शुभप्रभात,मित्रों.बात आज के अखबार की.
’मित्र’ एक बेहद खूबसूरत शब्द,यदि महसूस किया जा सके?
आज की बात—
सुबह-सुबह,अखबार हाथ में है,बीच-बीच में,चाय की चुस्कियां भी,
दो मेरीगोल्ड के बिस्कुटों के साथ,और शुरूआत जिंदगी की एक और
सुबह से--
धन्यवाद ’तुझे’ कि एक दिन और दे दिया-रात सोई थी,सुबह जगा दिया,आमीन!!
अब ,देने वाले ने अपना काम कर ही दिया—
क्या हम इस दिन की खूबसूरती बरकरार रख पाएंगे—देखना है,जब शाम सोने जांये??
जिंदगी बहुत खूबसूरत है—यह जुमला कह-कह चले गये-जाने वाले इस दुनिया से,और
जिंदगी बे-हद बदसूरत है-इसे भी कहना पड जाता है-अक्सर??
आइये:
पिछले दो-तीन दिनों की ऐसी खबरों से रूबरू हुआ जाय-जो खास खबर होने का दम-खम नहीं रखतीं-ऐसे गुजर जाती हैं-कि अरे,चलता है—
१.कल मेरी काम वाली-नहीं मेरी शुभचिंतक बेवी आई और हम दौंनो चाय शेअर करते हैं-सुबह की,बेशक मैं चाय पी चुकी होती हूं-जिंदगी शेअरिंग ही है.
सुना रही थी एक घटना-जहां वह रहती है-वहां एक ग्राहक महिला दुकान पहुंचती है-उसे शक है,कि एक किलो चीनी जो उसने वहां से खरीदी थी-तौल में कम है,सो,
उसने दुकानदार से कहा-कि चीनी तौल में कम है—शायद २५० ग्राम.
और,इस २५० ग्राम चीनी में १० लोंगो के सिर फूट गये-एक की मौत हो गयी,
दो-चार अस्पताल में मरने के इंतजार में हैं-पुलिस वाले-तमाशे-हकीकत-उसी की पहरेदारी कर रहे हैं-जिसने सिर फोडे-
ए,जिंदगी,तू २५० ग्राम चीनी की तौल में भी तुलती है???
२.कल के अखबार में एक खबर एक कोने में पडी हुई—
किसी दूसरे शहर में-एक सज्जन तीन भुट्टे खा लेते हैं-भुट्टे वाला पैसे मांगता है.और गोली चल जाती है—बेचारा भुत्टे वाला वहीं ढेर हो जाता है??
कमाल देखिये,भुत्टे खाने वाला भी अपने-आप को गोली मार लेता है.
कसूर किसका-भुट्टे बेचने वाले-भुट्टे खाने वाले का-कि बेचारे भुट्टे का??
पुलिस भी हैरान है.
समझ से परे-हमारी जिंदगी होती जा रही है??
३.आज,सुबह-सुबह मेरे शहर में बादलों वाला मौसम है-रात बारिश हुई है-सब कुछ भीगा-भीगा सा है-कल शाम करीब सात बजे मैं बारिश में घिर गयी थी-होसला लिये घर आ गयी-५ किलोमीटर की दूरी करीब दो घंटों में तय हुई-आ गयी सकुशल-वरना,
हमारे शहरों की सडकें करीब-करीब ६ महीने के हिसाब से बनती हैं-क्योंकि बाकी ६ महीने बैठा तो नहीं जा सकता,काम तो होना ही चाहिये,कर्म में विश्वास रखते हैं-और,माया आनी-जानी है—सो,आती-जाती रहनी चाहिये.
आइये,बात से हट गयी—महज १५ रुपये की देनदारी के लिये कत्ल पति-पत्नि का,-
वाह!! कहने को जी चाहता है??
हम सब संस्कारी लोग हैं-हजारों वर्षों के संस्कार ढो रहे हैं-दमडी को दांतों में दबाए-
जान जाय पर दमडी नाजाय!!
जिंदगी—यह तो ऊपर वाले के हाथ में है-
जब दे दे-और अब ले ले.
मिलेंगे—अगले जनम में.
ईश्वर आपको लंबी उम्र दे!!
हां:
लगता नहीं है दिल मेरा उजडे दयार में,
कोई हसरतों से कह दे कहीं और जा बसें-
लाये थे मांग के दो-चार दिन—
दो आरज़ू में कट गये-
दो इंतजार में—
्फिर भी उम्मीदों के बीज डालते रहिये-
बारिश के मौसम में सम्भावना है-
कुछ तो फूट आएंगे ही,आमीन!!
नमस्कार,आपका दिन मंगलमय हो!!!


Saturday, 23 July 2016

जो जीवन से चूक गया-स्वम से चुक गया.



शुभप्रभात:मित्रों
जितना है—वह काफी है.
मुट्ठी में जो है-वह हीरा है.
जो फेंक दिया गया-लौट कर नहीं आएगा.
अतः जीवन की झोली को बांधे रखिये-
वक्त के साथ-उसे खर्चिये भी.
आइये, आज की सुबह की शुरूआत करते हैं- ओशो की एक बहुचर्चित कथा से.
ऒशो:
मेरे प्रिय आत्मन,
अभी सूरज निकला भी नहीं था कि एक माझी नदी के किनारे पहुंच गया.
उसका पैर किसी चीज से टकराया,उसने देखा एक झोला कंकडों से भरा हुआ,
पडा था.
उसने अपना जाल निकाला और नदी किनारे बैठ गया-भोर की प्रतीक्षा में.
झोले में से एक-एक कर के पत्थर निकाल कर शांत नदी में फैंकने लगा.
और,धीरे-धीरे सूरज निकल आया,चारों ओर प्रकाश फैल गया-तब तक वह झोले में से सारे कंकड फैंक चुका था—आखिरी कंकड उसके हाथ में था-जिसे वह नदी में फेंकने ही वाला था-और सूरज की रोशनी में वह हीरे की नाईं चमक रहा था.
वह हीरा ही था!!!
माझी की सांस ठहर गयी.
वह अथाह खजाने को नदी में फेंक चुका था.
फिर भी,मांझी सौभाग्यशाली था,एक हीरा उसकी मुट्ठी में बच गया था.
जीवन के सबंध में हम सभी ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं.
जीवन एक   अद्भुत संपदा है-और हम नित-नित उसे कंकड समझ कर,एक-एक कर के जीवन रूपी नदी में फैंक रहे हैं.
सूरज का प्रकाश नित ही फैलता है-हम आंखों को बंद किये बैठे हैं.
जीवन रहस्यों से भरा पडा है—खूबसूरत खजाने हैं-आनंद की वर्षा हो रही है-और हम सूखे बैठे हैं,भीगते भी नही हैं,बारिश---??
जीवन से बडी और कौन सी मुक्ति हो सकती है-यदि जिया जाय तो??
मैं आपसे कहना चाहता हूं, जिंदगी जरूर हमें छोड कर चले जाना है,लेकिन जो असली जिंदगी है,उस छोडने का कोई उपाय नहीं—मकान बदल जाएंगे,दुकान बदल जाएगी,लेकिन जिंदगी?जिंदगी हमारे साथ होगी---.
मैंआपसे कहना चाहता हूं:जीवन के अतिरिक्त ना कोई पर्मात्मा है-नाही हो सकता है.
जीवन जीने के अलावा-कोई और रास्ता नहीं है.
जीवन के सौंदर्य के अलावा और कोई स्वर्ग नहीं है.
जीवन की बदसूरती से बढ कर और कोई बदसूरती नहीं हो सकती.
जीवन को साध लेना धर्म की साधना है.
जीवन के परम सत्य को अनुभव कर लेना,मोक्ष को पा लेना है.
जो जीवन से चूक गया,वह और सब से भी चूक गया,यह निश्चित है.
जो जीवन से चूक गया-स्वम से चुक गया.
सभार:संभोग से समाधि की ओर से.


Monday, 30 May 2016

ये आंसू मेरे—दिल की किताब है—



एक पोस्ट—पापा मुझे स्टेशन छोडने आया ना करो—
और, पापा का चेहरा—एक किताब बन गया—
जिसे पढ पायी एक बेटी—नजर बडी तीखी थी—
समझ बडी पैनी थी—
और—दिल में थी-वो यादें,जिन्हें हम चाह  कर भी
याद नहीं करते—क्योंकि हमारा ’आज’ बडा हो गया—और
वह जो ’कल’ था— बूढा हो चला है—
मजबूर हो गया है— अपने ’आज’ के खंडरहों पर—
खडा रह गया—नितांत,क्योंकि उसे अपने कल के ’सपनों’ की  फिक्र है—
अपने ’क” के सपनों के लिये ’सपनो” को सहेज रहा है
पापा—तुम इन आंसुओं को लेकर—स्टेशन मत आया करो.
जिन्हें—तुम छुपा नहीं पाते हो—
बांध नहीं पाते हो—उस बाढ को,जिसे
रात भर बांधने की कोशिश करते रहे हो—शायद.
ये आंसू मेरे—दिल की किताब है.
उनको प्यार—जो इन किताबों के पन्नों पर
लिखी इबारतें पढ पाते हैं—प्यार उन्हें, जो याद कर पाते हैं—
उन फिक्रों को—जिनके बोझ तले मां-बाप ता-उम्र जीते रहे—और
उफ़ भी ना की—कि कहीं बेटियां फ़िक्रमंद ना हो जांय कि-बेटे अपनी मंजिलों से
दूर ना रह जांय.
अक्सर ही आंसू अक्श होते हैं—दिल के.
जो कह नहीं पाते—वे कह ही देते हैं.
लेकिन—उन्हें पढने के लिये उस बेटी की आंखें चाहिये—जो
कह रही हो—पापा आप मुझे छोडने स्टेशन ना आया करो.
पुनःश्चय:’ आज’ तो जीना ही चाहिये—बीते हुए ’कल’ की दीवारें  पर कल के सपनों की इबारतें नहीं लिखीं जातीं—लेकिन,
कभी वो दीवारे ही—थामे हुए थीं—आने वाले ’कल’ के सपनों के महलों की दीवारों को.
जरूरी है—कम-से कम—उन ढहती हुई दीवारों पर होली-दीवाली मिट्टी का लेप करते रहें-
जिनसे—सोंधी-सोंधी महकें उठती रहेंगी—जब-जब ’आज’ पर से बयार,प्यार=स्नेह-सम्मान की गुजरेंगी.
सत्य हमेशा सुंदर है—और जो सुंदर है—वही शिव है.
बहुत सुंदर—बे-शक आंसुओं के सैलाब भी सुंदर होते हैं—अक्सर.
मक के-मनके.