Tuesday, 11 October 2011

नुक्ते—ज़िन्दगी के,

ये,राहों के सिलसिले हैं,दोस्त
                        सराहों में ठहरे, राहगीरों की तरह
                        कुछ देर का साथ था,
                        एक राह,कटती है ,उस तरफ
                        इस राह पर,हम हो लिये-----
चार रोज़ा प्यार की मज़ार पर
पिघलते हैं आंसू,तमाम उम्र के
पीछे छूटी राहों के गुबार में
परछाई भी तुम्हारी,अब, नज़र आती नही----
                         हथेलियों में,अब तलक
                         दौडती हैं,तुम्हारे लहू की,गर्माहटें
                         बंद है,मुट्ठी मेरी, अब तलक
                         छुडा कर हाथ,तुम ही,चले गये----- 

8 comments:

  1. हथेलियों में,अब तलक दौडती हैं,तुम्हारे लहू की,गर्माहटें

    भावों की गहन अभिव्यक्ति..

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. हथेलियों में,अब तलक
    दौडती हैं,तुम्हारे लहू की,गर्माहटें
    बंद है,मुट्ठी मेरी, अब तलक
    छुडा कर हाथ,तुम ही,चले गये----


    अत्यंत संवेदनशील रचना. बधाई हो उर्मिला जी.

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  4. चार रोज़ा प्यार की मज़ार पर
    पिघलते हैं आंसू, तमाम उम्र के
    पीछे छूटी राहों के गुबार में
    परछाई भी तुम्हारी, अब, नज़र आती नही...

    गहनता से गुंथी सुन्दर प्रस्तुति...
    सादर...

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  5. गहन भाव उकेरे हैं आपने.बहुत सुन्दर.

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