Wednesday, 30 July 2014

बीते दिन की कच्ची यादें




बीते दिन की कच्ची यादें
चुभती हैं बन कर शूल
मत आना साथी लौट कर
अब गईं हूं तुमको भूल
यशोदा अग्रवाल द्वारा रचित---नहीं होता है सावन खुशगवार,नामक शीर्षक के अंतर्गत २८ जुलाई के चर्चामंच में प्रकाशित, दिल को छू लेने वाली रचना—
मेरे भावों को रोक नहीं पाई या यूं भी कहा जा सकता है—भावों की धारा कुछ     और आगे बह निकली---
                   बीते दिन की कच्ची यादें
                   चुभती हैं बन कर शूल
                   मत आना साथी लौट कर
                   अब गई हूं तुमको भूल
           ओहः!!!
                             यह कैसा झूठ?
                             फ़रेब खुद से
                             खुद का ही
                             हूं, जैसे कोई चोर?
एक किताब
हरफ़ा-हरफ़ा
सपनों की स्याही में
ख्याइशों की कलम
डुबो---
लिखी थी---
चौबारों में---
छुप-छुप कर---
दिल के कोनों में
                                कैसे कह दूं?
पन्ने----
मैंने फाड दिये हैं
चिंदी-चिंदी कर
बिखेरे दिये हैं
दिल के—आंगन में
                             
नहीं, यह झूठ?
किताब----
अभी भी---
जिंदा है
बस---
वर्कों के कोनों को
मोड---
रख ली है
तकिये के नीचे
                           छुप-छुप कर
                           पढने को

10 comments:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-07-2014 को चर्चा मंच पर { चर्चा - 1691 }ओ काले मेघा में दिया गया है
    आभार

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  3. कह रही हैं घटायें सावन की।
    बात कह दी है आप ने मन की।
    और भी उलझनें है मन में या,
    सिर्फ ये ही वजह है उलझन की।

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    1. Thanks,
      The being is always the 'truth' irrespectable of time,space---so be truthfull to onesself.Osho

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  4. किताबें कहीं नहीं जाती ... गुम हो जाती हैं तो भी रहती हैं दिल के किसी कोने में हर्फ़ दर हर्फ़ ...

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  6. दिल को छूती भावपूर्ण रचना...

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