Wednesday, 20 May 2015

खयालों की तितलियां---


पंख फडफडा रही हैं

रात का पहला पहर है

अकेलेपन की सहर है

सामने बे-नूर से चेहरे

अपने बेसुरीले सुरों में

रोज की तरह आज भी

काले पर्दे पर---

बे-वजह के उत्पात मे मशगूल

आदतों से बे-जार से—

गलों को दे रहे हैं,तकलीफें

शायद—दिल की धडकने भी हो जाएंगी

बे-रफ्तार सी---

और,एम्बुलेसों की हूटरों में

अनसुनी सांसे,तीमारदारों की मजबूरियां

किसी अस्पताल में---

खाली जेबों में बंद हो

लौट आएंगी---

अपने-अपने घरों में,

बात शुरू करने के लिये,कभी-कभी नये-नये अंदाज-ए-बयां को ढूंढने के लिये हाथ-पैर मारने पडते हैं---सो मैं भी आज कुछ यही कर रही हूं—

क्षमा करें—बात कहना तो चाह रही थी गद्ध में और पद्ध से शुरू हो गयी.


पन्नों की पुरानी कतरने छांट रही थी,तीन कतरने हाथ लगीं,कभी काट कर रख दी थीं,फुरसत से पढने के लिये,और भूल गयी.

ऐसे ही हम जीवन में भी भूले करते रह्ते हैं--और हीरे छूट जाते हैं—कांच के टुकडे मुट्ठी में जकडे,हथेलियों को घायल किये उम्र जी लेते हैं---और हूटरों के शोर में गुम हो जाते हैं

पहला टुकडा---केल्हो पाउलो के एक उद्धरण से जो उनकी पुस्तक ’लाइक द फ्लोइन्ग रिवर’ से है.

जिसमें वे अपने एक संस्मरण को उद्धरित कर रहे हैं—

वे एक लेखक से मिलना चाहते थे उन लेखक का नाम—हेनरी मिलर था.लेकिन वे उनसे मिल पाए उनकी मृत्यु के बाद, (अक्सर हम देर कर देते हैं)

उनकी पत्नि (दूसरी) जापानी मूल की महिला थीं,जिनसे मिलने के लिये वे गये ताकि उन लेखक के प्रति अपनी भावनाओं व संवेदनाओं को उनकी पत्नि तक ही पहुंचा सकें.

जिस स्थान में उन लेखक की पत्नि रह रही थीं बहुत ही सामान्य जगह थी हालांकि लेखक

का स्थान लेखन-जगत में स्थान रखता था.

उनकी पत्नि ने अपने विख्यात पति की धरोहर को करीने से सजो कर रखा और स्वम एक गुमनाम जिंदगी में केवल अपने पति की उन यादों के साथ उतर गयीं जहां कोई उनकी अपनी पहचान भी नहीं थी.

हां, उनके लेखक पति की किताबों की राइल्टी की कीमत उनकी पहली पत्नि व उनके बच्चों तक पंहुच रही थी.

काल्हो पाउलो ने चलते समय उनसे आग्रह किया कि वे वही गीत सुनाएं जो अपने पति को सुनाया करती थीं---

और, नम आंखो से---वे गाती रहीं,उसी मधुर आवाज में—वही गीत जो वे अपने पति को सुनाया करती थीं---जब वे जीवित थे.

उनकी आंखों में सिर्फ प्यार था---कोई दुख नहीं था,कुछ ना मिलने का.

I think,love really was enough. Paulo Caelho.

Pl.wait for more ----.

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22-05-2015) को "उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच" {चर्चा - 1983} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

    ReplyDelete
  2. अति सुंदर कृति |

    ReplyDelete
  3. Thaknks to all the viewers of the--man ke-manke.

    ReplyDelete
  4. उम्दा प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  5. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

    ReplyDelete
  6. शांती जी क्रुपया अपने ब्लोग का लिन्क दीजिये.

    ReplyDelete