Tuesday, 26 May 2015

गलीचा---एक गलीचा रिश्तों का,मैने भी बुना था?

जब छोटी थी
तब,मां ने सिखाया था
गलीचे के धागों को पिरोना
हजारों गाठों को हजार गाठों से जोड़ना
             एक बार भूल हो गई
             गलीचे की हजार गांठों में
            एक गांठ कहीं छूट गई
            और गलीचे पर उभरे
            मोर-पंखों की पांते
            बिखर गई थीं.....
तब,सोचा कि
उधेड़ कर फिर से
हजार  गांठों से
हजार गाठें जोड़ दूं
             पर फिर वो जुनून न था
             जो पहले जीवन में भरा था
            अब वह रीत गया था
            और गांठों के मोर-पंख
            कही बिखर गये थे......
तब,मां ने कहा था
अब तुम रिश्तों के गालीचे पर
रिश्तों के मोर-पंख बिनोगी
ध्यान रखना कि एक भी गांठ रिश्ते की
कही छूट न जाय
मोर-पंख टूट कर बिखर जाएगें
तब रिश्तों का गलीचा
दरवाजे पर बिछा
एक पैर-दान की तरह बिछ जायगा


                           
(मन के-मनके)

9 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-05-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1989 में दिया गया है
    धन्यवाद

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  2. तब,मां ने कहा था
    अब तुम रिश्तों के गालीचे पर
    रिश्तों के मोर-पंख बिनोगी
    ध्यान रखना कि एक भी गांठ रिश्ते की
    कही छूट न जाय
    मोर-पंख टूट कर बिखर जाएगें
    तब रिश्तों का गलीचा
    दरवाजे पर बिछा
    एक पैर-दान की तरह बिछ जायगा
    सटीक कथन
    उत्तर दो हे सारथि !

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  3. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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  4. बहुत सुंदर भाव और मां की सीख को अपनी पंक्‍ति‍यों में हम तक पहुंचाया आपने...

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  5. बहुत सुंदर भाव, खूबसूरत प्रस्तुति

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  6. बहुत ही सुन्दर रचना।

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  7. रिश्तों के धागे ध्यान से पिरोने जरूरी होते हैं ... वर्ना उघड़ जाते हैं ...
    भावपूर्ण गहरी रचना ...

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