Tuesday, 11 March 2014

थोडा---सलीकेवार हो जाते तो,खूबसूरत हो जाते



बहुत ज्यादा हो गया यह दिखावा,यह भोंडापन—यह सटीरियोटाइप-पन.सब एक जैसा कि,नकल पर नकल,अकल पर नकल,शकल पर नकल—
आज जीवन कार्बन कोपी सा दिखाई देने लगा है,कहीं विविधता नहीं,कहीं कोई छाप नहीं,कहीं कोई हस्ताक्षर नहीं,कोई पहचान नहीं.
सडक पर निकलिये सब एक जैसे दिखाई देते हैं,शकलें भी एक जैसी दिखाई देतीं हैं क्योंकि तनावों ने शकलों पर एक जैसी लकीरें जो खींच दी हैं---हर आंख एक ही भाव लिये हुए है,हर मुस्कान नपी-तुली सी,ना ज्यादा ना कम.
जाम लगा एक होर्न के साथ अन्य होर्न भी लाइन में लग जाते हैं.ऐसा लगता है,कार्बन कोपी की मशीन खट-खट कापियां निकालती चली जारही है,और जीवन की किताब सिवाय कार्बन कोपी के पन्नों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है.एक पेज पढ लीजिये और किताब पूरी हो गई.
आज हम उत्सवों की भी कार्बन कोपियां निकालते चले जा रहे हैं,फर्क नहीं पड रहा अमीरी-गरीबी का,बस पन्नों का कुछा छोटा-बडा होना ही शेष रह गया है.
मातमपुर्सी भी अछूती नही रह गई है इस कार्बन कोपी के असर से.उतना ही रोना,उतना ही बैठना,उतना ही कहना-सुनना---वापस घर आ जाना---समय ना खिचता है ना सुकुडता है,लगता है एक जंगल सा उग आया है कुकुरमुत्तों का.
एक विवाहोत्सव में जाना हुआ,लडकी की शादी थी.
शुरूआत यूं हुई---जहां से जाना था और जहां पहुंचना था---करीब ८-९ घंटे का सफर था,सडक के रास्ते.कल्पना कर सकते हैं,उन राज्यों की सडकों की जहां राजनीति का परिवारीकरण हो रहा है.समस्त ताकतें वचनबद्ध हैं उसे मजबूत करने के लिए.ऐसे में अन्य ९९.९९ प्रतिशत शेष बचता है---टूटे सडकें ,सडकों पर गद्ढे,चौराहों पर जाम,बाजारों में बढते हुए दाम,सम्मानों की छीछालेदर---सुरक्षा के तार,बे-तार,के अलावा और क्या हो सकता है सोचनीय है?
खैर विवाहस्थल पर पहुंचते ही,एकमात्र व्यव्स्थापिका का सीधा फरमान---आप सब पहिले खाना खा लीजिये,आप सब के ही कारण यह सब कुछ रुका हुआ है.
ना कोई हाल-चाल ना कोई तसल्ली,नाही कोई अपनत्व की शिकायत-गिला-शिकवा.
जैसे-तैसे खाने की रस्मोअदायगी पूरी की,जैसे कार्बनकोपी के पन्नों की दरकार थी.
बाहर से आने वाले,घरवाले सब एक दूसरे से छिटके हुए से.पहचाने हुए भी बे-पहचाने से लग रहे थे.लोग ग्रुपों में बंट गए,अपने-अपने दायरे हो जाते हैं.
ढोलक की थाप---कहीं दूर से आती आवाज,यह भी जरूरी है.पांच-सात गीतों का घिस हुआ रिकार्ड बजना ही था,सुरों में जंग सी लग चुकी है,पुराने-नये का बेसुरीला संगम,बे-स्वाद हो रहा है.
शाम होते-होते गरमा-गहमी शुरू हो गई,लडकी जो दुल्हन बनने जा रही है---मिलने आई और हाथों की मेंहदी दिखाने लगी.ना कहीं,’मेरी शरमीली---मेरी शर्मीली---दो-तीन हम-उम्र उसके आगे-पीछे---पार्लर जाना है---पार्लर जाना है.
सुना है,दुल्हन का मेकअप १०,००० से शुरू होता है,खत्म कहां होता है,मालूम नहीं.
इधर दूसरा शोर शुरू हो गया---बाथरूम खाली है---खाली नहीं है---कौन सी साडी पहनूं—हर एक दूसरे से पूछ रहा है.अक्सर एक मौके के लिये तीन सेट रखे जाते हैं,चलने से पहले,फायनल एक करना होता है.एक राय घर में फायनल होती है और एक वेन्यूस्थल पर.
आज-कल,साडी की सेटिंग बहुत टेढी खीर है,कितनी पिनों की जरूरत  पडती है,किस साइज की पिन कहां लगानी होती है,कितनी प्लेट्स लगानी होती हैं,उनका झुकाव किस ओर होना चाहिये—दांई ओर अधिक या बांई ओर.
पल्लू की नीचाई-चौडाई कितनी हो,कांधे पर कहां सेट होना है---समस्या गम्भीर है.
साडी को अकेले सेट करना लगभग असम्भव है.अब कौन किसकी साडी सेट करे---समस्या फिर बडी हो जाती है क्योंकि सभी का मुद्दा एक है,चाहे वह २५ वर्ष की हो या ६५ वर्ष की हो,हर एक निर्भर हो जाती हैं ,इस अनुष्ठान को पूरा करते-करते.
बाल(केश) अब सभी के आज़ाद हैं---कोई बंधना-बधनी नहीं,वरन खूबसूरत लंबाई भी रो रही हर बार की कतर-ब्योंत से.क्या करें कार्बन कोपी का तकाजा है.फलां सीरियल---ठिकां सीरियल---फलां के बालों की लम्बाई इतनी है-उतनी है—क्या करें कार्बन कोपी का सवाल है---मजबूरी है.
अब आएं—विवाह-स्थल का नजारा—देखें और दिखाएं----
रोशनियों की चायनीज लटकन चारों तरफ बेतरतीब लटकी पडी थीं. हरे-लाल कालीनों पर ऊंची एडियां टेढी-मेढी होती रहीं.
शोर---बाहर चार-पांच शहनाईं वाले नगाडों की चोट पर,चीत्कार कर रहे हैं.अंदर घुसते ही डी जे पर---फेविकोल—कुइकफिक्स---पर हर उम्र टेढी-मेढी हो रही थी,कुछ नशे में,कुछ भोंडेपन में,अंदर की बात एक ही है.
सवाल कार्बनकापी का तकाजा है.
भीड का अधिक हिस्सा २०-२५ स्टालों पर मधुमक्खियाओं के झुंडों की तरह स्टालों के आस-पास मंडरा रहे हैं----मारा-मारी---पता नहीं—कितने भूखे हैं या दो-चार दिन से नमक का पानी पी रहे थे---खाने से अधिक खाना डस्टबिन में फेंखा जा रहा है---कार्बनकापी का सवाल है.
सब अपनी-अपनी तर्ज पर सब चल रहे हैं.
अब आती है बारात----
इतने शोर में बेचारे दुल्हे राजा बेसुरे बेंडबाजों के सथा अंदर आ जाते हैं और लोगों को पता भी नहीं चलता---क्योंकि सब अपने-अपनो शिड्यूल में चल रहे हैं.
जैसे-तैसे दो-चार संगी-साथियों के साथ,हिलती-डुलती स्टेज पर,सुनहरे सिंघासन पर विराजमान हो जाते है,कोई नहीं देखता,कोई फिक्रदान नहीं है---फोटोकोपी चालू है----.
शोर बरकरार है,आपा-धापी चल रही है—दोने चट रहे है ,फिंक रहे हैं---अब किधर जांय,क्या खाएं,साडियां जो सलीके से पहनी थीं बे-सलीके हो रहीं हैं----फोटोकोपी चालू आहे----
लीजिये दुल्हन का आगाज भी हो गया,वही तरीका,वही सलीका,नया सोचने को कोई तैयार ही नहीं,बडा आसान है पुरानी धुनों पर नये गीत लिख लेना.
चार-पांच सो काल्ड भाई-बहन एसकोर्ट कर रहे हैं,छः लोगों के छः हाथ थामे हुए है फूलों की चादर दुल्हन के ऊपर----मांफ करें चादर चढाई जा रही है जैसे मजार पर----बहारो फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया है---
और दुल्हन भी स्टेज पर चढ गईं जैसे-तैसे,क्योंकि स्टेज हिल ही रही थी.
अपने लहरदार लहंगे को ठीक से सेट कर के दुल्हे की दांई या बांई ओर बैठ गईं.अन्य मशगूल हैं अपनी-अपनी फोटोकोपी निकलवाने में----और इधर जयमाला भी पूरी हुई और शादी की लगभग रसम पूरी हो चुकी---फेरे तो फेरे हैं जीवन भर के.
डी जे कुछ मद्धम पड चुका है क्योंकि जो थिरक रहे थे अब वे भी थक चुके हैं और खाना भी तो है.यहां तक आते-आते आधे से अधिक जा चुके है मुंह पोंछते हुए और लिफाफा पकडाते हुए---आपका खाया,चुका भी चले.
शायद ही किसी में आतुरता हो वर-वधू की छटा को देखने की किसी को दरकार नहीं,सब कुछ नीरस सा,खानापूर्ती.
आइये आखरी दौर शुरू होता है---आइये फोटो खिचा लीजिये---आप कहां रह गये---आपने खिचा लिया---और अब तक दुल्ह्र राजा की कमर टेढी हो चुकी थी---दुल्हन का मेकअप पसीने-पसीने हो रहा है.
हम कब सोचेंगे----थोडा सलीकेवार होगें---थोडी खूबसूरती को बचाने के लिये कब खूबसूरत होंगे!
आइये अपने हस्ताक्षर ना भूलें---आपकी पहचान हैं.


9 comments:

  1. न जाने कहाँ कहाँ से मन के उन्माद को व्यक्त करने के तरीके ढूढ़ लिये हैं, चलिये अब सलीकेवार हो जायें।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-03-2014) को मिली-भगत मीडिया की, बगुला-भगत प्रसन्न : चर्चा मंच-1549 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सच में थोड़ा सलीका होना ज़रूरी है. एक दुसरे का देखा देखी ऐसे ही सब जगह हो रहा. बहुत अच्छा लिखा है, बधाई.

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  4. थोड़ा सलीकापण तो जरूरी है.वरना लोग भी क्या सोच लेते हैं.

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  5. सलीकपल जरूरी है पर इस सलीकेपन में कभी कभी इंसान बचपना और भोलेपन को खो देता है ... अति तो हर चीज़ कि बुरी है ...

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  6. सुंदर प्रस्तुति।।।

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  7. फ़ोटो कल्चर में लोग कैमरा देख कर ही सलीकेवार हो जाते हैं...हर पल को रिकॉर्ड करके समय को रोक लेने को आतुर...

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  8. बहुत खूब हस्ताक्षर ना भूंलें :)

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  9. बेहद जबर्दस्त पोस्ट …

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