Monday, 6 July 2015

मेरी नींदों के आंगन में

मेरी नीदों के आंगन में---                        


क्यारियां हैं---सपनों की
दिन चढे---चुनती हूं--बीज
सांझ  ढले--रख लेती हूं--गिनकर
जब,थक जाती हूं--अपनों से
जो बेगाने से हो जाते हैं--गैर
तो,सलवटों को झाड बिस्तर से
सिर रख लेती हूं--बूटे- वाले तकिये पर
कुछ यादें---जो आज भी ताजी सी हैं
कुछ बातें--जो आज भी बातें सी हैं
मैं--उनकी ताजिगीयत की चादर ओढ
उनसे ही कर लेती हूं--बातें--जी भर कर
मुझे मालूम हैं---
सपने--सपने ही होते हैं
फिर भी मजबूरी है--आदत की
बो देती हूं--रोज एक नया सपना
उन क्यारियों में--जो मेरे सपनों की हैं
शायद---हो सकता है!!
एक बीज ही फूट आए?
कौन जाने----!!!
कल-भोर-सुबह-जब-आंख खुले
अंगडाई में जब हाथ उठें--तो
तकिये के नीचे से--झांकता हो
कोई नन्हा सा सपना एक
दो पांखुरी वाला--दो पांखुरी छुपाए
जो खोलेंगी अपनी आंखें
कल-भोर-सुबह---!!!

Thursday, 2 July 2015

दो प्रेमी एक-दूसरे को बहुत प्रेम करते थे





ओशो एक कहानी अक्सर सुनाया करते थे—जब वे प्रेम को परिभाषित करने का प्रयत्न करते थे—वास्तव में आज जो प्रेम हम देख रहे हैं—एक अधिकार की दूषित मनोवृत्ति के अलावा कुछ नहीं है—जहां अधिकार है—वहां अहम के केकटस उग ही आते हैं और प्रेम का फूल इतना कोमल होता है कि छूना भी ऐसे हो कि देसी गुलाब की नाजुक पंखुडियां—जिन्हें छूना ऐसे होता कि वे कहीं बिखर ना जांय—उनके पास से गुजर जाना और उन्हें उनके परिवेश में विकिसित होने के लिये उनकी नैसर्गिक आजादी से छेड्छाड ना की जाय—वे खुशुबू बिखेरते ही रहेगें—जब तक हैं---और हमे फूलों से क्या चाहिये—पूछिये अपने दिल से—दिल भी यही कहेगा---केवल खुशबू.

अपनी बात मैं शुरू करती हूं—ओशो की एक कहानी से—कहानी कम है—एक खुशबू है— वे आजाद करने का मंत्र दे रहे है,प्रेम की महक को.

दो प्रेमी एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और प्रेमिका चाहती थी कि वे दौनों को विवाह कर लेना चाहिये.प्रेमी ने कहा वह एक शर्त पर विवाह कर सकता है—कि  विशाल झील के किनारों पर अलग-अलग घरों में रहेंगे—’अगर संयोगवश कभी हम मिलते हैं—सम्भव है नौका-विहार करते हमारा मिलन हो जाय या हो सकता है कि किसी दिन टहलते हुए हमारा मिलन हो जाय—दौनों हाथ-में-हाथ लिये हों—तब वह अतयंत सुखद होगा’.

इस कहानी को पढते-पढते—अचानक मेरी स्मृतियां मुझे दो-चार दशक पीछे ले गईं---प्रेम एक प्रतीक्षा है—बात समझ में आने लगी—और उसकी गहनता की सार्थकता भी. आज के परिवेश में उठ रही दुर्गंध जो इन सम्बंधों में उठती ,उस कूडेघर तक पहुंचना सम्भव हो जाता है.

हालांकि,आज समय बदल रहा है—बहुत ही तीव्र गति से—जो हमें हर-दिन भ्रमित कर रहा है—टेकनोलोजी का भी अपना प्रभाव है---नाकारात्मक अधिक है—कारण—इनके प्रति अवेअरनेस की कमी और कुछा सारभूत मूल्यों का अलोप हो जाना—अंधी नकल औरों की—पैसे की चमक—उसका बाजीरीकरण—बेहूदा उद्घाटन—बहुत-बहुत सी बातें हमें—भटका रही हैं जो अब इतनी बेहूदी खिछडी हो चुकी हैं कि बात कहां से शुरू हो कहना-समझना मुश्किल हो रहा है—एक पीढी तो विकराल अंधकार में लग-भग गिर ही चुकी है—अब सभांलना कैसे हो--- कौन सभांले--बहुत प्रश्न उठ खडे होते हैं—और हमारी पीढी मूक-द्दृषटा बन कर रह गयी है.

खैर—तब विवाह परंपरागत ही होते थे---जहां बहुत सी बातें इतनी दूर हो जाती थीं कि एक सहज उत्सुकता को बनाए रखती थीं दो लोगों में.बहुत भीनी-भीनी सहजता होती थी—महकी-महकी होती थी प्रतीक्षा!!!

कितने वर्ष गुजर जाते थे कि—एक-दूसरे को पूरी तरह देखने के लिये भी प्रतीक्षा करनी होती थी—एक रिवाज बहुत ही खूबसूरत था—विवाह के बाद गौना—एक रीति थी—विवाह के बाद केवल कुछ दिन ही वर-वधू साथ रहते थे वो भी रिश्ते-नातों से घिरे हुए—एक ऐसी प्रतीक्षा सो मधुर सपनों से सुवासित होती रह्ती थी—सावन माह में वधुओं का अपने माता-पिता के घर जाना—बेटियों का यहां आना—वो भी एक-दो माह के लिये---और प्रतीक्षा का फूल बारिश की झडी में और भी महक उठता था—

हालाकि—आज की परिस्थियों में ऐसा होना तो संभव नहीं है—लेकिन रिश्तों की खूबसूरती को संवेदनाओं से छूना-- उसके प्रति प्रतिबद्ध होना—ये गूढ रहस्य को खोलना जरूरी है—जिंदगी के गूगल पर जाइये—खोलिये उस साइट को जहां एक पेज खुलेगा—जो की-बर्ड है—जीवन के सभी साइटों का—सीखिये—हम सीख सकते हैं.

इस साइट पर भी कुछ समय बिताइये.

सौदा महंगा नहीं है---एक दूसरे की स्वतंत्रता की गरिमा को कायम रखना और एक-दूसरे के ऊपर आधिपत्य की भावना को तिरोहितो करना—यही कुछ छोटी-छोटी बातें हैं  जो जीवन में फैली कीचड में भी कमल के फूल खिला सकती हैं.

जीवन को सहजता से ना लेना—और—निर्थकता में अपने-आप को डुबो देना—जीवन के खिलने से पहले ही जीवन को सडा रहा है.

शायद ही कभी—हमारे हाथों में हाथ होते हैं.

असम्भव है—किसी निर्जन झील में हम नौका-विहार कर सकें—बगैर इस विचार के-कि क्या मांगना है—कि क्या नहीं देना है.

प्रेम एक प्रतीक्षा है.

प्रेम में लेन-देन है ही नहीं.

अहम की जमीन बंजर होती है,जहां प्रेम का बीज पल्लवित हो ही नहीं सकता.

प्रेम एक ओट है---झीनी सी.



Wednesday, 24 June 2015

यही छटा है—जीवन की



शुरू करती हूं—कुछ पंक्तियों से—जिन्हें आप जो भी नाम दें—स्वीकार है,क्योंकि शब्द तो उतर आते हैं—लेकिन पता नहीं चलता कहां से आए—जैसे सीगल की तरह—नीले पांखों वाले सुंदर पक्षी—अब किस देश से आए—मैं पूछती भी नहीं—बस यही क्या कम है—वे इस निर्जन तट पर आ तो गये---!!!
बहुत बे-बाक है,मुहब्बते—आरजू
जैसे कोई आ गया हो- परवाज कोई
दूर सरहदों के पार से—
मेरी सरहदों पर— एक मुलाकात के लिये
वक्त की रेत पर,जहां
अहसास की हर लहर
पोंछ जाती हैं—हर इबारतें
आज की—पहचान की
क्योंकि,अब-तक मैंने
जाना ना था—
अब जाना है,कि
हर कोई यहां
हर-पल--
एक ही तलाश में है
हर हाल में--
कोख के काले अंधेरों में
उजाले की तलाश है
उजालों में—
सहारों की तलाश है
जब कदमों पर आ गये तो
थामने को एक-उंगली की तलाश है
राहें मिल गयीं,तो
एक मंजिल की तलाश है
झिल-मिल नीद की ओढे चादर
तो,सपनों की तलाश है
सपने मिल गये तो,
एक मुट्ठी की तलाश है,
फिर एक और तलाश की
एक और तलाश है--??
तिनके-तिनके से जुडा एक आशियाना,
जिसे तलाश है—रहगुजर की,कि
किलकारियों की गूंज—
जो दूर-दूर होती जा रहीं
उन आवाजों की तलाश है
जो पास अब आनी ही नहीं?
हर एक तकिये को तलाश है
उन खुशबुओं की—जो
एक दिन—सूख ही जानी हैं
उन हथेलियों की—जो
सिर के नीचे से—
सरक ही जानी है---
फिर भी यहां हर कोई,एक
तलाश है--
तलाश को तलाशते हुए?
एक तलाश है??
और,ये तलाशें---
झुर्रियों के चिलमन के उस पार से
हमें देख—मुस्कुरा देती हैं—धीरे से---
यही जीवन की छटा है.
जो आई है—उस पार से.
किस पार से----??
जो लहरों पर फैला है—
उगते सूरज की नारंगीयत लिये
ढलती सांझ की,मटमैली ओढे चादर
यही एक तलाश है---जहां हर तलाश
डूब जाती है अनंत के क्षितिज में
और— हो जाती है क्षितिज---
क्षितिज की तलाश में---
हा-हा-हा---!!!                             
                                                          
                                              



Thursday, 18 June 2015

एक शाम—सुबि के साथ



एक शाम—सुबि के साथ 

कल रविवार था.
एक ऐसा रविवार जो कुछ हट कर बन गया,सुबि के साथ.
अब आप पूछेगें ही कि यह सुबि कौन है---क्या करती है---आदि-आदि.
तो,मैं बताने जा रही हूं—कि यह सुबि कौन है?
जिंदगी भी क्या अजीब चीज है,एक पिटारा,एक अनबूझ पहेली,एक रास्ता तो कभी-कभी
लगता है कि बस बहुत हो गया अब,मिल गयी मंजिल,नहीं यह सब क्या है,क्यूं है,कैसा है??
और हम चूक जाते हैं इस पिटारे में से निकालने में---जादू का झंडा,आलू का पराठा,दही के भल्ले,गोल-गोल गोलगप्पे,फालूदा और लकडी की डंडी पर चुपकी मेवे वाली कुल्फी---
और जूडे की बेंडी,बेले की माला,रंगीन चप्पल,फटफटाती जूतियां---
ओह!! क्या कहने जा रही थी---खोल कर बैठ गयी पिटेरा—--जिंदगी का.
सुबि—मेरी पोती,मेरी ट्यूटर—जिससे सीखती हूं—कम्प्यूटर—बार-बार भूलती हूं और पूछती हूं—
और वह सब्र से बार-बार वही चीज दुहरा देती है.
मैं ओशो को पढ रही थी—एक शब्द से वे पहचान करा रहे थे—सिन्स्क्रोनोंसिटी---एक नया शब्द जो बाद में शब्दकोष में शामिल किया गया---
उसका शाब्दिक अर्थ करना सटीक नहीं हो पाएगा—हां कुछ चीजें गूंगे का गुड हो जाती हैं.
ठीक इसी तरह यह शब्द भी है---सिनक्रोनोंसिटी.
ओशो ने अपनी जीवनी (स्वर्णिम बचपन ) में इस शब्द का उल्लेख किया है एक घटना के माध्यम से--.
’ठीक जिस सज्जन के बारे मैं बात कर रहा था,उनका पूरा नाम था प.शम्भुरत्न दुबे.हम सब उनको शम्भुबाबु कहते थे.
जिस क्षण शम्भुबाबु और मैंने एक-दूसरे को देखा,कुछ हुआ.उसी क्षण हम दौनों के हृदय एक हो गये---विचित्र मिलन हो गया.जिसे कार्ल गुस्ताव जुंग सिनक्रोनिसिटी कहते हैं.
मैं तुम्हें कह रहा था कि फ्रेंडशिप.मित्रता प्रेम से ऊंची होती है---प्रेम तो पार्थिव है,मित्रता इससे थोडी ऊंची है---फ्रेंडशिप,मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है---मैत्री तो सीगल है—हां जानाथन की तरह.यह बादलों के भी ऊपर उठती है.) ओशो,स्वर्णिम बचपन से,साभार.
हां,तो मैं बात कर रही थी—सुबि की—हममें में भी शायद मित्रता का ही कोई शूत्र हो—मैं ऐसा ही सोचती हूं—क्योंकि हम मिले कुछ समय के लिये और सिनक्रोनोसिटी घट गयी!!!
यदि मैने ओशो को ना पढा होता तो शायद—इसे ना समझ पाती.
अब कहना पडेगा—डीअर सुबि से—Don,t say—granny—so harsh—not beautiful—just call me ‘uma’ –and feel the ‘Cinchronocity’.
कुछ रिश्ते तो बने बनाये हमें मिल ही जाते हैं---कुछ बनाने-निभाने पडते हैं---और कुछ उतरते हैं—सीगल (एक पक्षी सफेद-नीले पंखों वाला ) की तरह.
हां, अभी-अभी तो तुमने भी कहा था—Age  doesn’t matter---so carry on---dear Subi!!!
मुझे पुकारो—मेरे नाम से,मित्रता के नाम!!!