Monday, 6 July 2015

मेरी नींदों के आंगन में

मेरी नीदों के आंगन में---                        


क्यारियां हैं---सपनों की
दिन चढे---चुनती हूं--बीज
सांझ  ढले--रख लेती हूं--गिनकर
जब,थक जाती हूं--अपनों से
जो बेगाने से हो जाते हैं--गैर
तो,सलवटों को झाड बिस्तर से
सिर रख लेती हूं--बूटे- वाले तकिये पर
कुछ यादें---जो आज भी ताजी सी हैं
कुछ बातें--जो आज भी बातें सी हैं
मैं--उनकी ताजिगीयत की चादर ओढ
उनसे ही कर लेती हूं--बातें--जी भर कर
मुझे मालूम हैं---
सपने--सपने ही होते हैं
फिर भी मजबूरी है--आदत की
बो देती हूं--रोज एक नया सपना
उन क्यारियों में--जो मेरे सपनों की हैं
शायद---हो सकता है!!
एक बीज ही फूट आए?
कौन जाने----!!!
कल-भोर-सुबह-जब-आंख खुले
अंगडाई में जब हाथ उठें--तो
तकिये के नीचे से--झांकता हो
कोई नन्हा सा सपना एक
दो पांखुरी वाला--दो पांखुरी छुपाए
जो खोलेंगी अपनी आंखें
कल-भोर-सुबह---!!!

4 comments:

  1. नींद के आंगन में ऐसे ही सुन्दर सपने खिलते रहें सच होते रहें
    सुन्दर भावों से सजी कविता

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  2. जरूर पूरी होती हैं ऐसी ख्वाहिशें ... क्योंकि वो सपने भी तो खुद ही पूरे करने होते हैं ....
    इसलिए सपने देखना बंद नहीं होना चाहिए ...

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  3. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (08-07-2015) को "मान भी जाओ सब कुछ तो ठीक है" (चर्चा अंक-2030) पर भी होगी!
    --
    सादर...!

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  4. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

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