Wednesday, 31 August 2011

एक अह्सास-जीवन का,जन्म लेने का,जन्म देने का

     मां की कोख में,बीज-रूप में,जीवन-स्पंदन,फिर वही ईश्वर की परिकल्पना है,जिसे हम उस मृग की तरह ढूंढते हैं,जंगल-जंगल भटकते हैं,जो अपने सिर में छुपी कस्तूरी की महक के पीछे भटकता
रहता है.
जब पहली बार मां की कोख इस स्वर्गीय-स्पंदन के अह्सासों से भर जाती है,तो विचार बनने बंद हो जाते हैं,सब कुछ कहना चाह कर भी,कुछ नहीं कह पाते हैं,व्यक्त,अव्यक्त हो जाता है और,अव्यक्त,व्यक्त हो जाता है.अह्सास पहेली सी बन जाती है,विराट हो जाता है हर अह्सास.
   एक संपूर्ण जीवन,इस छोटे से स्पंदन में कैसे समा गया,कहां से आ गया,वह जीवन जो,धरती परअपना पहला कदम रखते ही ना जाने दुनिया की चाल को कैसे मोड दे? इसी स्पंदन में यहां संत,बुद्ध,महावीर,कबीर,महायोद्धा सिकंदर,अकबर,शाहेजहां जिन्होंने जीवन की परिभाषाएं रचीं. दूसरी ओर ऐसे-ऐसे,धूर्त-पापी भी,इस स्पंदन में समां गए जिन्होंने मानवता को ज़लील किया और इसी मानवता का नाश भी किया.
    फिर,एक बार उस ईश्वर के आगे नतमस्तक होना चाहिए कि एक बूंद,एक स्पंदन में उसने अपनी कलाकारी दिखा दी,अपनी माया फैला दी.

Wednesday, 24 August 2011

एक अह्सास-जीवन का,जन्म लेने का,जन्म देने का

जीवन की उपजाउ धरती पर पडा जीवन रूपी नन्हा सा बीज , जब धरती मां की कोख मे पहली बार कुलबुलाता है तो वह अहसास है जिसे रुपी पृथ्वी पर हर वह जीव जीवन देने की क्षमता रखता है जिसे वह ईश्वर प्रद्त्त वरदान के रूप मे पाता है एसा अहसास जो शब्दों से परे है , जिसने भी पाया निहाल हो गया .
कभी कभी , धरती मे दबा बीज जब कुछ घन्टे , कुछ दिन बाद अपने अन्दर छिपी जीवन के सम्भावनाओ के पंखो को खोलने लगत है तो अचानक जाने कहां से चमतकारित करने वाली ,नन्ही- नन्ही , हरी- हरी कोमल सी दो पक्तियां बीज मे से फूट पडती है मन अजीव खुशीयॊ मे भर जाता है अरे! ये कह से आ गयी , अनायास ही मुंह से निकल पडता है .
और ! सामने ईश्वर की छाया मे दिखने लगती है . वह ईश्वर , वह भगबान , वह आधार जिसे सुनने , जानने , देखने व पाने के लिये हम भटकते रहते है अन्धे की तरह .
वह अहसास् हमे थोडी देर ठहर के महसूस करना चाहिये भागना तो कब्र तक है लेकिन ईश्वर  के दर्शन कर लें ईश्वर को छु ले और उसे पा तो ले .
एक अहसास बीज को मिटटी मे दबाने का , उसे सीचने का उसे सहेजने का और जीवन के स्पंदन को छूने का.
जरुरी नही जीवन को छूने के लिये बीज को ही बोया जाये , जहां जीवन की सम्भावनाएं हो तो उन सम्भावनाओं को हकीकती अहसास देना ही इस अहसास को पा लेने के समान है.
इसके विपरीत ,दूसरा अहसास जीवन की सम्भावनाओ को असंम्भव बनाना है यदि हमारे पास साधन है , वक्त है , योग्यता है--  इन संम्भावनाओ को असम्भव नही बनाना चाहिये.
एक बीज,जिसे हम नम मिट्टी में दबा देते हैं,उसमें फलदार पेड होने की क्षमता छुपी है,जो हमारे एक अह्सास से दुबारा हजारों बीजों के माध्यम से जीवन की हजारों संभावनाओं को, पृथ्वी पर
हमारे लिये बिखेर देगा.
     अह्सास का दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है—जमीन में अंकुरित होते हुए बीज को निर्दयता से,
बाहर निकाल दें और इस तरह एक बीज की हत्या के अह्सास ने हजारों बीजों के जीवन के अह्सासों
को कुचल दिया.
      ईश्वर ने हमें ’अह्सास’ दिये हैं,केवल शुद्ध रूप में,पवित्र रूप में—यह तो मनुष्य की मानसिकता है,उस अह्सास को वह किस रूप में स्वीकार करे या विकृत करे.
     मां की कोख में,बीज-रूप में,जीवन-स्पंदन,फिर वही ईश्वर की परिकल्पना है,जिसे हम उस मृग की तरह ढूंढते हैं,जंगल-जंगल भटकते हैं,जो अपने सिर में छुपी कस्तूरी की महक के पीछे भटकता
रहता है.    



अह्सास

चार अक्ष्ररों के समूह का एक शब्द—जो मनुष्य-जीवन के भावात्मक संसार का आधार है.
अहसास-शब्द ही वह शब्द है, जो मनुष्य के भावात्मक संसार को समेटने की क्षमता रखता है.
    मेरे विचार से, यह शब्द हिन्दी भाषा की शब्दावली का नही है,इसे हमने उर्दू भाषा की शब्दावली 
से तोहफ़े के रूप में लिया है.वैसे तो हमारी रोज़मर्रा की बोलचाली भाषा में न जाने कितने शब्द उर्दू,
फारसी के शामिल हो गये हैं,जिन्हें अब हिदी भाषा से अलग करके समझना भी संभव नहीं है.
   एक और तथ्य है,जो मैं अनुभव कर पाती हूं, कि ज़िंदगी के कुछ रूप,कुछ खास शब्दों के माध्यम से ही समझ आते हैं, तब उन पर किसी खास भाषा का अधिकार नहीं रह जाता है.
सारी सीमाएं विलीन हो जाती हैं,बस,अह्सास सिर्फ़ अह्सास ही होता है,जैसे मुंह में घुली मिश्री की मिठास की तरह.
  अह्सास का दायरा बहुत बडा होता है,जिसमें रसों के नवरंग,रंगों के नवरंग,नौं कलाएं जीने की,नौं ढंग मरने के हो जाते हैं,क्षितिज की तरह जहां सीमाएं,सीमाएं न रह कर,क्षितिज हो जाती हैं,बस.
   अह्सासों से परे जीना संभव नहीं है और जब संभव नहीं है, तो सही अह्सासों के साथ जीने में
बुराई क्या है?
ईश्वर ने अह्सासों का पिटारा हमारे सामने खोल दिया है,अब चुनाव करने की जिम्मेदारी हमारी ही है.

Sunday, 21 August 2011

अनुभूतियां

तुमने,वह अह्सास तो दिया होता
जिसकी छाया की छांव तले
आज की तपिश को
ठंडा कर पाती------
                और,अह्सासों की बारिशों की
                नन्हीं-नन्हीं,बूंदों से----------
                क्लांत-भ्रांत पथिक के----
                पथ को ठंडा कर पाती
पर, तुम गये तो------
यूं गये कि,मेरी सांसों को
मेरी आसों को—बेआस कर गये
बे-सांस कर गये-------
                 काश! जब हम दो
                 हमराह होकर चल रहे थे
                 तो, अपने अह्सासों की
                 कोई महक तो बिखेर देते
                 अपने स्पर्शों की गर्माहट को
                 मेरे हाथों पर दे जाते-----
  तो, कुछ तो होने का अह्सास लिये