Wednesday, 6 November 2013

नुक्ता-चीनी


 
              १.ओ----सुबह के,गुमनाम से राही,
               मगर, अपने से----
               आते हो रोज,बिना दस्तक दिए,
               मेरे खामोश दरवाजों पर,
               देखना----
               कल यूं ही ना चले जाना!!!
               मैं,अपने सपनों की बाडों को तोडकर—
               आ बैठूंगी---डूबते तारों की छांव तले,
               कुछ कहकर जाना---
               सुन भी जाना---

               २.रंगों की रंगोलियां---
                सजा जाना---
                मेरे दरवाजों की ड्योढी पर,
                उन फूलों से---
                जिन पर कभी नाम लिखे थे,मेरे,तुमने
                इस बार दिवाली पर---
                बहुत-बहुत बार मनाईं हैं,
                सूनी-सूनी सी--- दीवालियां मैंने,

               ३.पट खोलने दो---
                आती-जाती,
                इन हवाओं के लिये
                क्या पता----
                ज़िक्र ले आएं मेरा,
                जो होते हैं—मेरे,
                मेरी पीठ के पीछे,


              ४.पट खोलने दो,
                इन भंवरों की,
                गुन-गुन के लिये,
                क्या पता---
                कुछ गीत हों---
                मेरे लिये भी,
                अपने हजार गीतों की
                अनछपी किताब में से,

             ५.उम्र को यह क्या हो गया है!!!
               रेत सी सरक रही है---
               बंद मुट्ठियों की भिंची दरारों से,
               वो भी-----
               बे-आवाज!!!
               बे-खौफ!!!

             ६. घर को अंधेरा कर----
               घर के दिये को,
               लेकर चली थी,
               औरों के घरों को,
               रोशनी दे दूं---
               पर,वहां तो---
               घर नहीं,गलियां नहीं,
               शहर ही स्याह था,
               और,मेरा दिया भी---बुझ गया,
               ’सच’ के,अंधेरों में---

             ७.यह जो,अंधेरा---
               गहरा रहा है,
               उम्मीदों के इशारे हैं,
               वहां---क्षितिज के छोर से—
               कोई,सूरज लेकर आ रहा है,
               थोडा इंतजार ही सही---
               मैं,इंतजार में हूं----

  नुक्ता-चीनी----कभी-कभी,मन करता है,कुछ अपनी जिंदगी से भी कर ली जाय.
तो,पेश हैं---कुछ अंदाजे-बयां-और---कुछ की हैं शिकायतें, खुद की खुद से ही.
पसंद आएं तो,कुछ कहियेगा जरूर.
                                        मन के-मनके

                         

         

Monday, 21 October 2013

पिंजरे की तीलियों से बाहर आती मैंना की कुहुक—सुधा अरोडा

द्वारा एक आलेख जो चर्चा मंच में,दिनांक २१.१०.१३ को प्रकाशित किया गया.
यह आलेख स्वर्गीया श्रीमति चंद्रकिरण सोनरक्सा की साहित्यिक यात्रा का एक संस्मरण है—
मन को छू गया,बहुत कुछ कह गया,झझकोर गया,नींद से जगा गया---
’वह पीडा और समाजिक अंर्तनाद ही मेरे लेखन का आधार रहा’
आत्मकथ्य से—
अपने घर का कूडा या महज अपने जीवन का कच्चा चिट्ठा मान कर---साहित्य कूडा फेंकने का मैदान नहीं है---यदि कूडा मैदानों में ना दिखाई दे तो शायद समाज के पुरुषवर्गीय ठेकेदारों को अपने घरों में फैली दुर्गंध भी महसूस ना हो—जो अक्सर उन्हीं के द्वारा फैलाई गयी होती है(क्षमा चाहती हूं,यदि किसी को कोई आपत्ति हो.यह मेरा विचार है,जो किसी व्यक्ति-विशेष पर लागू नहीं होता है,केवल,समाजिक मानसिकता के परिपेक्ष में कहा गया कथन है.पुनः क्षमाप्रार्थी हूं)
समाज का”स्त्री वर्ग’ सदियों से इस दुर्गंध को अपने में समेटे जीता रहा,और मर्यादाओं की दीवारों को अपने अहम के चौटिल कांधों का सहारा देता रहा.
हमारे समाज की आधारशिला स्त्री के सतीत्व पर रखी गयी---तभी तो सीतामैया को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना पडा और निर्दोश सिद्ध होते हुए भी,आर्द्श पुरुषोत्तम भगवान के द्वारा निष्काशित हुईं.
साहित्य के बीज---समाज- रूपी,सडी-गली मिट्टी में ही पनपते हैं और जो नहीं पनप पाते,वे महज कागजी फूलों के पौधे ही बन कर रह जाते हैं,जिनसे आप अपने घरों की सजावटें मनपसंद फूलों से तो कर पाते हैं,परंतु वहां खुशबू हो ही नहीं सकती.
ऐसा साहित्य धरोहर हो सकता है,परंतु जीवन-रहित,वो जीवन जो ’सत्य’ के साथ खडा हो—उसका सामना कर सके---और समाज का एक वर्ग,अपने अहम की चोंटों से,दूसरे वर्ग के अहम को बे-वजह चौटिल ना करता जाय.उस वर्ग को स्वीकार भी करना चाहिये,तुम्हारे द्वारा गठित मर्यादाओं के शीश-महलों को,दूसरे वर्ग ने अपनी सहनशीलता,त्याग,करुणा व प्रेम से सभांले रखा,सदियों से सदियों तलक—खुद ’मौन’ हो विगत होती रहीं.
आस्तित्व को हिला गया—स्वर्गीया चंद्रकिरण सोनरक्सा जी का आत्मकथ्य.
हम सभी के अंर्तमन में एक आत्मकथ्य दबा पडा है,मर्यादाओं की निर्मम चट्टानों के नीचे.
एक साहस,आत्मदर्शन,आत्ममंथन की आवश्यकता है,कि अपने-अपने मौनों की चोंटों से उसे निकाल कर बाहर ला सकें और समाज को,समाज का असली चेहरा दिखा सकें.
कोशिश होगी---मैं भी अपने आत्मकथ्य की माटी पर,शब्दों के बीज बिखेर सकूं,संवेदनाओं से सींच सकूं---और कुछ फूल ’सत्य’ के खिला सकूं,जिनकी खुशबुओं से कुंठित मानसिकता को जगा सकूं.
पुनः




Tuesday, 8 October 2013

कुछ स्मृतियां---अनुभूतियों की छांव तले


 
पीपल के सूखे पत्ते पर,एक मासूमियत,अपने शैशव की करधनी में लटकीं,खिलखिलाहटें

आंगन में रुनझुन बिखेरतीं------आज भी करीब ४५ साल बाद,सुनहरे फोटोफ्रेम में---मेरी पहली धरोहर,मेरे आस्तित्व के निचोड की एक बूंद----हरदिन,हरपल,मेरी कोख में,एक स्पंदन सी,जीती है.

वह स्पंदन तुम्हारे आस्तित्व से क्योंकर छिटक गया???

या तुम सत्य की छाती पर,अपने भविष्य के रथ को रोंदते हुए निकलते रहे-----

कह नहीं सकती----क्या तुम्हारी मजबूरियां थीं?

क्यों तुम संवदनहीनता की हर सीमाओं को रोंदते रहे---निरुत्तर हूं----भ्रमित हूं----आहत हूं—और अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के झंझावतों में घिर आई हूं.

खलील ज़िब्राल(लेबनीज़ दार्शनिक-कवि)

द्वारा रचित कुछ बेहद खूबसूरत पंक्तियां पढने को मिलीं----

And a woman who held a babe against her bosom said,Speak to us of children

And he said—

Your children are not your children.

They come through you but not from you.

And though they are with you yet they belong not to you.

They are the sons and daughters of life’s longing for itself.

कई बार पढा----पहली बार लगा कितने सुंदर भावों को,मोतियों सा चुन---एक माला सी पिरोई गई हो---

दूसरी बार पढा---एक मोती,एक प्रश्न बन छिटक कर गिर गया----your children are not your children----तो मेरे ही आस्तित्व से पुलकित वह स्पंदन कौन था---जिसे मेरी रक्त शिराओं ने हर पल सींचा----मिट्टी में गिरा एक बीज जब पौधा बन आकाश की ओर बढने लगता है,उसमें रंगों से भरी,महक बिखरने लगती हैं,फूलों से डालियां झुकती हैं तो,उस मिट्टी का ना होना कैसे नकारा जा सकता है---बीज की सम्भावनाएं,मिट्टी के हर कण-कण में निहित हैं.

सत्य है,वृक्ष की अपनी निजी संभावनाएं होती ही हैं,फूलों की अपनी अलग पहचान,परंतु बगैर मिट्टी के ये पहचान काव्य की कुछ पंक्तियां ही रह जाती हैं---दर्शनशास्त्र की भूलभुलैया---जहां सत्य को गाया तो जा सकता है,उसे विभिन्न कोणों से देखा जा सकता है---परंतु सत्य की लकीरों को मिटाया नहीं जा सकता है ना ही छोटा-बडा किया जा सकता है.

मैं किसी भी दार्शनिक-कवि की काव्यांजली को पढना अवश्य चाहूंगी---गुनगुना भी,किंतु कुछ गीत स्वप्न सरीखे ही होते हैं---मैं चांद को आंचल में भ्रर लूं---मैं खुशबुओं को मुट्ठी में भर लूं---मैं सूरज को आंगन में आंमंत्रित कर लूं---बहुत-बहुत सुंदर गीत लिखे जाते रहें हैं,गाते-गाते,सुनते-सुनते,निःसंदेह एक और ही दुनिया में प्रवेश हो जाता है---फिर जब नींद टूटती है,तो वही दीवारों के घेरे हैं,वहीं सकरी होती उम्मीदें हैं,यह वह सत्य है जो खुली आंखों से दिखता है,हाथों से छू सकते हैं ,पैरों को लहूलुहान करते है,ये रास्ते सत्य के.

वो सुनहरा फोटोफ्रेम,करीब ४५ वर्ष बाद भी,यूं का त्यों सुरक्षित है,उसका कांच भी उतना ही पुराना है,एक बार भी नहीं चटका है.

कुछ संवेदनाएं बेशकीमती हैं,संवेदनाएं ना हों तो आप के स्पर्श की गर्माहट ना होगी,आंखों में तैरती मुस्कुराहट ना होगी,इशारों की परिभाषाएं पथरीली हो जाएंगी.

सुनो---एक छोटे सी कहानी कहने जा रही हूं---१८-१९ साल की एक लडकी,अपने बिखरे अतीत की परछाइयों को लांघती,सुनहरी धूप से भरे आंगन में कदम रखती है,सकुचाई सी,सहमी सी,परंतु विश्वास से भरी कि इस आंगन को बुहारूंगी---आंगन के कोने में तुलसी का बिरवा सींचूंगी,संध्या-दीप से घर-आंगन को जग-मग करूंगी.आंगन से लगा चौका होगा,जहां भोरसुबह  से ,पतीलियां गर्म होती रहेंगी,थालियां लगती रहेंगी---दालें उफनती रहेंगी,साग सुधियाते रहेंगे.

रात थक कर चूर जब बिस्तर पर पैर रखूंगी तो एक स्पर्श,मेरे कांधे पर मुझे तृप्त कर जाएगा---

एक छोटा सा सपना---मेरे आस्तित्व का स्वाधिकार.

और नहीं जानती थी,अ ब स,इस रचना का,एक अल्हडपन बस एक सपना एक घर बसाने का.इससे अधिक सपनों के बीज नहीं थे मेरे पास,बोने के लिये.

सुबह-सुबह---कोख में कुछ स्पंदित हुआ,कुछ घबडाहट सी हुई,कोख पर अपनी हथेलियों को धीरे रखा,आंखें कभी बंद होने लगी,कभी खुलने लगीं,कुछ तो है???

ये कमरे में आए---कुछ कहने के लिये---मैं पुलकित हो गई---सुनो,जरा अपना हाथ देना—क्यों क्या बात है? अरे! जरा अपना हाथ यहां तो रखो---ये उलझन से भरे,अनमने मन से अपना हाथ हठा लिया---मैं अपनी दौनों हथेलियो की गर्माहट को तुम तक पहुंचाती रही.

यह था मेरे-तुम्हारे बीच पहला संवाद.पता नहीं मैंने जो कहा वह तुमने सुना या नहीं.परंतु मैं संभावनाओं के बीज को सींचती रही,बस एक चाह के साथ कि जो भी आस्तित्व मेरे गर्भ में पल रहा है वह पूर्ण हो.

हर दिन मैं मां बनती रही,कोख विकसित होती रही,तुम्हारे आने से पहले,तुम्हारा भोजन मेरी रक्तशिराओं में बह कर मेरे आंचल को भरता रहा.

और एक दिन,तुम अपने आस्तित्व को लिये,मेरे आस्तित्व से छिटक,इस संसार के खुले प्रकाश में,बंद मुट्ठियां लिये,सहमी-सहमी खुली आंखों के साथ,मेरे दाएं कांधे से सटे,लेटे हुए थे.

मैं डरते-डरते तुम्हे छू रही थी,निहार रही थी—क्या चमत्कार—क्या लीला---कैसी कलाकारी है---

तुम्हारे पापा के द्वारा खींचे गये,ब्लेक एम्ड व्हाइट फोटो जो मैंने स्केन करके लेपटोप पर डाल दिये हैं---करीब ५०० से अधिक ही होंगे.

वो केमरा भी तुम्हे याद होगा,रशियन केमरा,जिसे तुम अपने साथ ले गये हो,उम्मीद है तुमने सभांल कर रखा होगा.

४५ सालका अंतराल एक जीवन को जीने के लिये काफ़ी है.एक-एक दिन की हजार-हजार यादों को जी लेना----शब्दों से परे है,क्या याद रखें क्या भूल जांय.

यादों को समेटने के लिये,संवेदनाओं को जीना होता है,रोज उनकी जडों को सींचना होता है.

शायद---तुमने अपनी सम्वेदनाओं को सींचना छोड दिया है---उन्हें सींचना शुरू कर दो----उम्मीद है वे फिर से हरी हो जांयेगी---उम्मीद है जीवन के झंझावतॊ में,तुम्हें कुछ छांव दे पाएं—सुकून अवश्य देंगी.

मरुस्थल में भी,कुछ ताड के पेड होते हैं जो छांव तो नहीं देते,कम-से-कम,कुछ मीठे फल तो अवश्य देते हैं.

पुनः---

Your children are not your children------

And though they are with you,but not from you----???

Monday, 9 September 2013

गम नहीं---कब्र पर मेरी,चढाए कोई




                                कत्ल कर दो फूलों का,गुनाह करे कोई
           दो आंसू भी बेशकीमती हैं,बचाया जाय,खुशियों के लिये
           क्योंकि,गमों के कांटों में,बामुश्किल खिलते हैं,फूल खुशियों के
                           यकीन पहुंचा दिया, उन हवाओं ने,जो---
          बह आईं,सात समुंदर पार से------कि
          खुशबू पहुंच गई है, इन फूलों की,जो----
          दरकते दिल पर,यूं ही खिल आये थे---- मेरे
                                             मन के-मनके

Thursday, 6 June 2013

कुछ कहानियां-----


                   एक  छोटी निजी यात्रा पर---कुछ दिनों के लिये जाना हुआ---
अपने,व्यक्तिगत जीवन-लय की चुप्पी को तोडने का एक प्रयास---साथ ही,जीवन की लयबद्धता को अनगिनत आयामों से झांकने की एक कोशिश----ये रिश्ते क्या कहते हैं?
हर रिश्ते का आधार-भूत रिश्ता,दो इंसानी रिश्तों पर कायम,जिसे समाज के द्वारा मान्यता दी गई होती है---विभिन्न समाजिक परिवेशों में,ये मान्यताएं,परिस्थितिजन्य विभिन्नताओं को लिए होती हैं.
यहां,किसी का नाम व पहचान के बगैर,उस रिश्ते की परिभाषा, ना कि,मर्यादा को टटोलने का प्रयास भर करने का ही मेरा आशय है,क्योंकि किसी की निजता को छेडने का,अधिकार किसी को भी नहीं है.
दो व्यक्ति,इस आस्तित्व के दो बिंदु,अपनी जिंदगी शुरू करते हैं,एक छत के साये में,दिन-रात गुजारते हैं,हर स्तर पर,मानसिक,आर्थिक,शारीरिक---परंतु,आत्मिक कतई नहीं,किसी भी कारण से नहीं---अपवाद यहां भी हैं.
जीवन ,सुबह-शाम की परिधि में घूमता रहता है,परिवार भी पनपने लगते हैं,एक-दूसरे के प्रति,उत्तरदायित्व को भी एक सीमा में बांध दिया जाता है----आर्थिक लेन-देन का भी बाजारीकरण होने लगता है---इनवेस्टमेन्ट,भविष्य की सुरक्षा----आने वाली पीढियों के लिये,कुछ उत्तरदायित्व निभाने की फेरिश्त आदि-आदि,सब कुछ सुचारू-रूप से चलने लगता है,ऐसा लगता जरूर है—डोक्यूमेन्टेनशन,फिक्स डिपोजिट्स,प्रोपर्टीज---निःसंदेह कुछ गोल्ड भी,परिवार की धरोहर के रूप में,कुछ लोकरों में सीलबम्ध हो जाते हैं,हस्तांतरित होने के लिये.
पर----वो कहां है---जिस पर पूरी कायनात टिकी हुई है???
एक निश्चछल प्यार,बिना किसी सौदे बाजी के---हर आती-जाती सांस के साथ,बढता जाय,पनपता जाए---भविष्य को सुरक्षित करने की आवश्यकता क्या--जब आज इतना सुरक्षित और खूबसूरत हो---कल के स्वर्ग की प्रतीक्षा कौन करे---इसी पल की मिट्टी में,भविष्य-बीज निहित हैं.
हम में से,करीब-करीब सभी,इसी बोझ को कांधों पर धोए जा रहे हैं----अपवाद यहां भी हैं.
आज का जीवन,हिसाबी-किताबी,एक रुटीन का हिस्सा है,जहां सपनों में कोई और प्रतीक्षा जोह रहा है,एक ऐसे राज के साथ,जो उम्र भर खुलते नहीं हैं,और साथ चले जाते हैं.
बहुतॊं से मै्ने सुना है(निःसंदेह कुछ निजी वार्तालापों में)’कुछ राज,मेरी जिंदगी के, मेरे साथ ही जाएंगे’.
एक प्रश्न---वो राज, जीवन की खूबसूरती क्यों नहीं बन पाते?
वो राज,गुलाब की पांखों की तरह,जीवन को क्यों नहीं महका पाते?
वो राज,आने वाली पीढियों के जींस में प्यार का बीज लेकर क्यों नहीं जन्म ले पाते?
बहुत-बहुत प्रश्न हैं----अपवाद यहां भी हैं.
कहानी नंबर एक---
सोचा,क्यों ना अपने से शुरू करूं—सो,कुछ लिखना शुरू कर रही हूं.
जीवन के पडाव, साल-दर-साल गुजरते जाते हैं.वैसे तो समय की कोई सीमा नहीं है,एक धारा है निरंतर,वहां ना कोई गंगोत्री है,और ना ही कोई महासागर,विलीन होने के लिये.
हमने, समय को सीमा में बांधा है,अपनी सुविधा के लिये या यूं भी कह सकते हैं---हम, जीवन-मृ

त्यु सीमा में बंधे नजर आते हैं,जबकि ऐसा भी नहीं है,यह यात्रा भी निरंतर है,बिना किसी आरंभ-अंत के.
हो सकता है,मेरा नजरिया दार्शनिक लगे परंतु, जब जीवन को समभाव में जीने लगते हैं तब वहां सीमाएं विलीन होने लगती हैं,समस्त आस्तिव एक निरंतर धारा की नाईं नजर आने लगता है.पीछे मुड-मुड कर देखिये,आभास सा होता है,हम तो वहीं हैं, जहां दस वर्ष पहले थे.
सो, यही मानवीय प्रकृति-प्रवृति है,क्योंकि उसके पास विचारीय-शक्ति है, जो गढने-रचने में माहिर होती है,वरना मनुष्य के आस्तित्व के अलावा,आस्तित्व में प्रत्येक आयाम समय-सीमा-विहीन है---सो प्रकृति के साथ,एक-रस हो कर जीता है,मरता है—पुनः,पुनः—ना कोई सुख-दुख,ना कोई सुबह-शाम.
फूल खिलते हैं,मुरझाते हैं ,इस खिलने-मुरझाने में भी लयबद्धता है,जहां कोई रुकावट नजर नहीं आती.
और,यही कारण है,प्रकृति में केवल मनुष्य ही है,जो सुख-दुख,जन्म-म्रुत्यु की अवधारणा में खुद को जकडे हुए है,और खुद की बनाई कैद में जिये चला जाता है.
वस्तुतः, जहां ना कोई जन्म-दिन है,ना कोई हेप्पी-बर्थ-डे है,ना कोई मातम-पुरसी है---और जीवन-धारा
निर्बद्ध है---एक धारा-- अनंत-यात्रा.
प्रस्तावना कुछ बडी हो गई,क्षमा करें.
१९ मई को मेरा जन्म दिन था,कह नहीं सकती,कोई प्रमाणिकता भी नहीं है,मैंने अपने बडों से जाना,हां, पंडित के द्वारा लिखा हुआ,तिथि-नक्षत्र का एक दस्तावेज,अभी भी मैं सभांले हुए हूं,जतन से—यह प्रमाणित करने के लिये,कि मैं,६६ वर्ष की हो गई हूं.
समय बहुत-बहुत बनावटी हो गया है,नहीं, हमने उसे बनावटी बना दिया है.इसमें गुंथी तारीखें,लगती हैं प्लास्टिक के फूलों की एक माला है,जहां ३६५ दिनों को एक-एक नाम देकर
नकली फूलों की माला की तरह पिरो दिया है.एक चलन,एक रिवाज,एक फैशन,और इस पिरोने की व्यवस्था में टेकनोलोजी बहुत कारगर सिद्ध हो रही है---एक रिवाज,फेसबुक—एक फैशन.
एक शहर में,कुछ दूरी पर अपने रह रहें हैं(यह भी परिभाषित करना अब जरूरी हो गया है कि,’अपना’ हम किसे कह सकते हैं और कहना चाहिये) आते-जाते,अपनों के दरवाजों के सामने से गुजरते भी होंगे----लेकिन ऐसे मौकों पर वे अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं,फेसबुक के माध्यम से.
खैर,आप और हम मन मसोसे भी तो कितना,कब-कब और आखिर क्यूं?
फैंकी हुई शुभकामनाओं को हम भी उठा लेते हैं,सूखे हुए फूलों की तरह,जहां ना कोई खुशबू है,ना कोई कोमलता और हथेली पर रखते ही बिखर जाती हैं, पंखुडियां.
कभी-कभी,अपने बहुत दूर चले जाते हैं---पास होते हुए भी,परिस्थितिवश,अक्सर स्वंम की गढी वितृष्णाओं के कारण---दूरियां मीलों में ही नहीं नापी जाती.
क्यूं?
आज की टेकनोलोजी दूरियों को समेट रही है,जाने-अनजाने,हम उसे लंबा कर रहे हैं.मन की सीमाओं को कौन काटेगा?
इस जन्मदिन पर,मैं ढूंढ रही थी अपनों को,कुछ तो मेरे पास ही थे----लेकिन,जिनको खुद आना था,उनको बुलाने का प्रयोजन फीका सा लगने लगा.
कभी,अपना, जाना जरूरी होता है----कभी-कभी उनका भी आना जरूरी है.यही बात समझ आ जाय तो----? संजय ,रचना,गुन-गुन---ऐसे मेरे परिचित,जिनसे परिचय किसी औपचारिकतावश हुआ और समय के साथ-साथ अनौपचारिक होता गया.
उन्हें जब मालूम हुआ कि-----यह दिन मेरे जीवन की एक खास तारीख है,तो----’आंटी जी,आपको हम इस दिन अकेले नहीं रहने देंगे.’
वैसे तो जीवन-यात्रा नितांत अकेले ही चल रही है,और वैसे भी हम सब, भीड में भी अकेले ही हैं,अब कान को कैसे भी पकड लीजिये,फर्क नहीं है.
सुबह से ही मैंने घर को एक नया लुक देने का प्रयास किया---शाम होते-होते,घर की सभी बत्तियां जला दीं,मन की दीवाली मन से ही मनती है.
सफैद-गुलाबी कोंबनेशन की एक हल्की साडी का चुनाव किया और खुले बालों के साथ तैयार हो गई.जरूरी नहीं बालों का लंबा होना.
और,शाम करीब ८ बजे,दरवाजे की बेल बजी,ऐसे मौकों पर कदमों की आहट,आने वालों की पहचान बता देती है.
दरवाजा खुलते ही-----हेप्पी बर्थ डे,आंटी जी---पता है, यही तो कहना है.
संजय,रचना का एक साथ कहना—आंटी जी आज आप बहुत अच्छी लग रहीं हैं.
पता था,फिर पूछा---क्या कल अच्छी नहीं लग रही थी.
होता है,कभी-कभी,ऐसा भी होता है.
Can you imagine???
जीवन में पहली बार,केक काटा,वह भी---हेप्पी बर्थ डे टू यू,की टिन-टिन के साथ.
हम नाहक ही विदेशी रीत-रिवाजों को नकारते हैं,कारण स्वंम को पोषित करने के लिये.
मैं,अपने आंसू रोक नही सकी---इतनी खुशी,इतना अपनत्व जो सम्भाले नहीं संभल रहा था.
क्यों कि,अप्रत्याशित सदैव ही चौगुना हो जाता है.
आंखे,ऊपर उठ गईं कृतग्यता में---और क्या चाहूं ,क्या मांगू,किसकी प्रतीक्षा,उनकी जो आना नहीं चाहते या उनकी जो आ नहीं सकते?
क्यूं नहीं उन खुशियों को समेटूं जो मेरे दरवाजे की डोरबेल बजा रही हैं.
इसके बाद,कुछ यादगार,बहुत ही सुंदर स्नेप्स,सत्य ही मन की प्रसन्न्ता और संतोष
सुंदरता बन मेरे चेहरे पर साफ झलक रही थी,वैसे मेरे स्नेप्स,अक्सर अच्छे नहीं आते हैं.
कोशिश करनी पडती है---कि,चेहरा ऐसे करूं,या---
बेहद खूबसूरत पलों को समेटे,जहां मैं कहती रही मेरे ६ नाती-पौते हैं,और क्या मांगू---वहां,गुनगुन अपना अधिकार मांग रही थी----नहीं,६ नहीं ७..
और संजय का पूछना---आंटी जी,आज सच-सच बताइये आपकी उम्र क्या है?
६६ वर्ष पूरे कर लिये.
आज,यदि,१०० वर्ष की होती तो---नहीं छुपाती.
काशः
पुनः,आंखे टिक गईं कमरे की छत पर,कृत्यग्यगता से----
why can’t we see---the ‘Rainbow’ in the clouds???