Monday, 9 June 2014

छोटी-छोटी बातें----




१.      जून का महीना
जून का महीना---पूरा उत्तर भारत सूरज में सुलग रहा है---
कुछ दशक पूर्व,६०-७०-८० के दशक में,कूलर अपर-क्लास की पहुंच में ही थे,बाकी पंखों से ही काम चला लेते थे.
इनकी(पंखों की)---
भी एक कहानी हुआ करती थी.
टेबुल-फेन हुआ करते थे,काले रंग वाले,शायद एक-दो माडल ही थे बाजार में.प्रतिस्पर्धा नहीं थी बाजार में---इससे अधिक की जरूरत भी नहीं थी---प्रतिस्पर्धा केवल पडोसी से हुआ करती थी.
सनसनाती आवाज के साथ जब वे घूमते थे,हम बच्चे उसके चारों ओर घूमने लगते थे.हादसे भी हुआ करते थे,किसी की फ्रोक का कोना फंस गया तो किसी के पाजामें का पांयचा----और फंखे के साथ-साथ हम भी उलझ जाते थे,और धम्म से पंखे के साथ नीचे जमीन पर आ जाते थे.
कोहराम तो जब मचता था जब हममें से किसी की उंगली पंखे की पंखुडियों में फंस जाती थी—कौतुहूल इतना कि जान पर बन आती थी.
धीरे-धीरे पेडेस्टल पंखों की भी आवाजाही होने लगी,एक पायदान ऊपर.लेकिन हम बच्चों की कहानी वही थी---फसना-फसाना,गिरना-गिराना----और हादसों से गुजर जाना.
सीलिंग फेनों ने इन हादसों पर पूरी तरह रोक लगा दी---और हादसों के इतहास के पन्नों में दबी किताब,करीब-करीब पूरी हो गई---हां कभी-कबार स्विच बोर्डों के छेदों में अपनी कन्नी(सबसे छोटी उंगली) डाल कर माप लेते रहते थे---कौतहूल था जो हम बच्चों को चैन से बैठने नहीं देता था.
७०-८० के दशक में कूलरों का आगमन हो चुका था---वो भी मर्यादा में.
जिस घर में कूलर हो तो एक और सीढी चढ लेते थे---स्वर्ग की.
भरी दोपहर,सुनसान सडकें,दरवाजे घरों के सील-बंद---अंदर कूलर की हू-हू और घरवालों के खर्राटे.
उस समय कूलर तक की पहुंच कम ऊंची ना थी.
मुझे याद आ रहा है---अनुभव आप सब से शेअर करना चाहूंगी---आपके पास भी कुछ ऐसे अनुभव अवश्य होंगे.
हमारे यहां कूलर की परिकल्पना ने दस्तक ८०-८२ में दी.कोई भी कल्पना बिना पंखों के परवाज नहीं चढती है और वो पंख मिलते थे किसी पडोसी के कूलर में कुछ वक्त बिताने के बाद.
परिकल्पा को वास्तविकता बनने में करी-करीब दो साल लग गये.
उम्मीदों के तारों को थामना और उम्मीदों के शिखर को छू लेना रोमांचित करता था.
छोटी-छोटी आशाएं थी,छोटे-छोटे कदम---सब साथ-साथ चलते थे.बजट में कटौती हालांकि खुद बजट ही कटौतीवाला हुआ करता था---और जब एक सपना साकार होता था छोटे-बडों को रोमांचित कर देता था, फिर दूसरी परिकल्पना से अपने सपनों की डोरी बांध लेते थे---साथ-साथ.
ऐसे ही साल-दर-साल गुजर जाते थे,सपने देखो,पूरे करो और बडे होते जाते थे सपने---सपनों के साथ-साथ हम भी.
याद आ रहा है---घर में जब पहला फ्रिज आया था.जो सब्जियां रोज की रोज खरीद कर काम चलता था अब हफ्ते भर की खरीदने लगे थे ताकि फ्रिज भरा-भरा लगे,फलों की रेढियों की तरफ भी रुख करने लगे थे.
घडों का पानी बर्षों से पीते थे अचानक गरम लगने लगा. फ्रिज के आने के बाद घडा ही गर्म लगने लगा.घडा बेचारा स्टेंड से कब नीचे आ गया आभास ही ना हुआ और एक दिन कोने में उलटा हो गया---चुपचाप---और कब कोना भी सूना हो गया बे-आवाज!!
सपने कम होने लगे हैं---आशाएं भी कम ही जन्म लेती हैं---अफोर्डबिलटी इतनी हो गई है कि---गये बाजार---चीजें साथ-साथ आने लगी हैं---पहले पीछे-पीछे आती थीं---महीनों- साल लग जाते थे.
उस दोरान सपनों से भरी नीदें हुआ करती थीं---उम्मीदों से भरे दिन.
खैर ,वक्त के तकाजे हैं—
चीजों से घर लबालब हैं—
मन खाली है,आशाओं से—
नींदे---सूनी-सूनी सी हैं---
सपनों के बगैर?
२-रेजगारियां
 पिछले हफ्ते,अपने एक मित्र-परिवार के साथ, उनके शहर, एक छोटे से त्रिप पर,जाने का मुझे अवसर मिला.
उनके परिवार के साथ गुजारे वो चार दिन जेब में पडी रेजगारी की तरह खनकते हैं.
एक छोटा सा आयोजन,जमावडा ३०-४० लोगों का!!!
दो-चार लोगों से तो मेरा पहले से भी परिचय था बाकी लोगों से पहली बार मिलना हुआ---मिलना ऐसा कि अपनत्व की खुशबू में सरोबार हो जाना---जैसे कि पडोसी के घर आए हों---जैसे कि दो-चार दिन को गये थे वापस आ गये हों---
साथ-साथ बैठना---खाना-पीना—बातों की लडियां पिरोना—एक में से एक---कब सुबह हो---क्षमा करें सुबह का होना ना होना बराबर ही था जब सोए ही नहीं तो कैसी रात और कैसा दिन?
हां,खाने से पता चल जाता था कि सुबह का नाश्ता कर रहें हैं तो सुबह ही होगी.
जून का महीना---घर के एक कमरे में ए.सी(बाकी कमरों में भाप फेंकते कूलर.जी हां अब कूलर गरम होने लगे हैं)
अदभुत नजारा---एक-एक कोना ओकुपाइड---एक से नहीं दो-तीन से.
आयोजन बडा नहीं था फिर भी बडा था-- सबकी बडी शामीलियत से.
फेशियल,मेंहदी,सडियों का चुनाव—सूटों की सेटिंग---
बच्चों की धमाचौकडी,बडों की आवाजाही---
नाश्ता निबटा नहीं लंच शुरू—खरबूजों की खुशबू,लस्सियों की मलायकियत.
शरबतों के मीठे-मीठे गिलास,कोल्डड्रिंक की बोतलें—कुछ खुली—कुछ लुढकी सी—
कौन कह सकता है कि जून का महीना है,सडी गरमी है---पसीना महकता है?
खाना वही है,खाने वाले भी वहीं हैं—लेकिन सहभागिता प्रश्नरहित हो सब प्रश्नचिन्ह बे-मानी हैं---जेब में पडे सिक्के कौन जाने एक के है दस के हैं---जब खनकेगें तो सिर्फ आवाज होगी कोई पहचान ना होगी.
कभी-कभी जेब में पडी रेजगारी भी लुभाती है---जब वह खनकती है.
कभी-कभी कुछ रेजगारी---जेब में रख कर घर से निकलिये---किसी पडोसी के साथ---आनंद आएगा.



3 comments:

  1. रोचक वृतान्त...

    ReplyDelete
  2. http://www.parikalpnaa.com/2014/06/blog-post_9128.html

    ReplyDelete
  3. बिल्खुल ठीक कहा है .

    ReplyDelete