Friday, 11 July 2025
क्या फर्क पड़ता है
Saturday, 11 January 2025
हम सभी बेचैन से हैं न
Monday, 12 June 2023
चिट्ठियाँ अब आती नहीं
१. चिट्ठियां अब आती नही
चिट्ठियां अब जाती नहीं
कलम से स्याही छिटक गयी , कहीं
दिलों के लफ्ज भी अब सूख गए हैं.
२. लाल डिब्बे का सुर्ख रंग
धूप में बदरंग हुआ जाता है
हर रोज " अनुमा"
पीले पोस्टकार्ड की अकड़
ढीली पड़ गयी है
नीले लिफ़ाफ़े पर
ख़त लिखने की वजह
बेवजह हो गयीं
वो हिसाबी ,किफायती नजर के पैमाने
अब रुखसत हो गए हैं
जो , कागज़ के मोड़ों पर भी
अपनी फ़िक्र अपनों के लिए लिख कर
कमजोर चश्मों में डबडबाई आँखों को
और कमजोर किये जाते थे .
३. चिट्ठी आई है , क्या
चिट्ठी लिख दी है, क्या
अब इस बात की फ़िक्र
परेशां कहाँ करती है .
बरसों की बिछड़ी
किसी बाप की चिट्ठी,
छप जाती कहीं किसी
अखबार के चौथे पन्ने पर
पर, लिखने वाले का पता,
लिखने वाले के साथ बेवजूद हो गया है.
और, पाने वाले लिखने वाले का नाम भूल गए.
४. एक तार हुआ करता था
हर घर के एक कोने में
जंग लगी कील पर लटका ,
पांच सेर के बोझ को साधे
वो बोझ था तीन, चार पीढ़ियों के प्यार का,मनुहारों का
शिकायतों का ,फटकारों का ,माफीनामों का
शादियों के निमंत्रणों का ,राखियों के भिजवाने का,पाने का
नमस्कारों का,चरन्स्पर्शों का ,आशीर्वादों का
यहाँ सब कुशल है ,आप सभी की कुशलता की कामनाओं का
और क्या लिखूं ,थोड़े को बहुत समझना ,बाकी आप सब समझदार है
और, आग्रह पत्र का उत्तर शीघ्र देना जी,प्रतीक्षा में---
आपका ,आपकी ,तुम्हारा ,तुम्हारी के ढेर सारे नाम ,उपनामों का बोझ
जहां वर्षों पुरानी चिट्ठियों में ये सब चेहरे नजर आते थे,
उनके , जो कभी हमारे बीच थे ,हमारे अपने .
धन्यवाद ,चिट्ठियों वाले तार .
Thursday, 1 June 2023
प्रेम एक सेतु है---
महान सम्राट अकबर ने भारत की एक छोटी सी लेकिन बहुत ख़ूबसूरत राजधानी
बनवाई-फ़तेह पुर सीकरी . लेकिन इस शहर का उपयोग राजधानी के रूप में
कभी नहीं हो सका क्योंकि अकबर की मृत्यु इसके बनाने से पूर्व ही हो
गयी थी .
इस नगर के निर्माण में हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा गया . उन दिनों के महान वास्तुकारों व महान सदगुरुओं से विचार्विमर्ष लिए गए .
सम्राट अकबर ने उन दिनों के महान शिक्षकों से एक छोटा सा वाक्य देने को कहा जिसे उस नगर के प्रवेश द्वार पर लिखा जा सके .
फ़तेहपुर सीकरी जाने के लिए एक नदी पार करनी होती थी जिस पर बना हुआ पुल वहां ले जाता था और अकबर ने उस पुल के अंत में एक सुन्दर विशाल पुल बनवाया था जिस के प्रवेश द्वार पर सूफी संतों ने उस सुन्दर वाक्य को लिखने का सुझाव दिया .
और वह सुन्दर वाक्य ,वह सुन्दर सूक्ति थी---
जीवन एक सेतु है ,उस पर घर मत बनाओ !
प्रेम भी एक सेतु है ---- उससे होकर गुजर जाओ !
यह ख़ूबसूरत कथा ओशो के प्रवचन से ली गयी है .
धन्यवाद ओशो .
Tuesday, 9 May 2023
आइये एक कहानी कहते हैं----
मल्टीमीडिया के आने के बाद हमारे जीवन से कहानियां कहने व सुनाने का रिवाज ही लुप्त हो गया है
करीब ५,६ दशक पहले के ये किस्से हैं जो सुनाने जा रही हूँ--हममें से आज भी कई होंगे मेरे जैसे जिन्हें याद होगें वो किस्से कहानियां जो,उन्होंने सुने होंगे अपनों से ,जब घर के कामों से फुरसत हुई होगी और गर्मियों में छत पर बिस्तरों की कतारें बिछ गईं होंगी.
जाड़ों की लम्बी,लम्बी रातों में मोटी,मोटी रजाइयों में दुबके सुनते थे हम और ना जाने कब सो जाते थे ,कहानियां सुनाने वाले कहानियों में खो जाते थे.
छोटे थे बड़ों से किस्से सुना करते थे ,अब बड़े हो गए हैं , जो जीवन जिया वो ही कहानियों किस्सों जैसा लगने लगा है.
मन करता है सुनाऊँ उसी लहजे में जिस लहजे में सूना करते थे ,पर अब ना तो छतें रहीं ना ही बिस्तरों की कतारें ना ही मोटी,मोटी रजाइयां और जाड़ों की लम्बी,लम्बी रातें .
किस्से यूं कि---
जैसे किसी सुनहरे द्वीप की कहानी हो---
कि, हमारे जमाने में दो रूपए का एक सेर असली घी आ जाता था--
हमारे जमाने में दो रूपए का गाडी भर अनाज आ जाता था--
और ,इसी सन्दर्भ में कुछ किस्से तो हमने भी जिए हैं--
दस,बारह आने की एक सेर ,चीनी हम भी खरीद कर लाते थेअखबार की रद्दी से बने लिफ़ाफ़े में.
रोज दो,चार मेहमानों की थालियाँ हमने भी परोसी हैं,रसोई समेटने के बाद .
साल में आठ ,दस त्योहारों पर काढाइयां गर्म होती हमने भी देखींहैं . घर के कामगारों के लिए पकवानों के परोसे हमने भी निकाले हैं ,सम्मान के साथ .
आज परिवारों की परिभाषा ही बदल गयी है. बदल ही नहीं गयी है ,बल्कि ,चकनाचूर हो गयी है .
लगता था परिवार नहीं है रिश्तों का एक पिरामिड है--जहां,हरउम्र के रिश्ते अपनी, अपनी महक के साथ जीवंत थे .
जीवन में गति तो चाहिए परन्तु टकराहट नहीं . इससे जीवन का रस रीत जाता है .
प्रस्तुत संस्मरण मेरी पुस्तक---खुशबुएँ सूखे फूलों की से प्रस्तुत किया गया है.
धन्यवाद :
आगे भी--
Saturday, 3 September 2022
नशे ,नशे में फर्क नहीं
फर्क है तो , असर नहीं
नशे,नशे में फर्क नहीं,फर्क है तो असर नहीं
नशा हो बोतल का या हो पीडाओं से जाम भरा
या ,आंसू की गर्माहट साँसों में आई उतर
या, काँधे ढलक गए ,अपनों की अनदेखी से .
या , अपनों ने हो छला पुनः पुनः
रख हाथ कंधों पर धोकों का
या , तिरिष्कार के तीर बिंधे
लहू शिराओं से रिस भर आया हो जामों में .
या, दरवाजे से विदा हुई अर्थी कोई अपने की
घर,खाली खाली हो ,भर आया हो जामों में .
यह तेरी मधुशाला है,यह मेरी मधुशाला है
कुछ ,कुछ कुछ ,कुछ भरा ,भरा .
हर कोई यहाँ पीता ह हर कोई यहाँ जीता है
कोई भर ,भर जाम झूमता ( सूफी सा)
कोई अधभारा जाम लिए राजा से रंक बना .
बस . एक गुजारिश नौसिखिये की
पी , पी , पी , बस जी भर पी कर जी .
Wednesday, 31 August 2022
नीले ,पीले ,सफेद , गुलाबी फूलों वाली घास और गुब्बारों वाले फूल
अब क्यों नज़र नहीं आते ?
खबरें आने लगीं हैं इस दशक के अंत तक हम चाँद पर बसने लगेंगे .वहां की मिट्टी पर कुछ फसलें भी उगाई जाएँगी शायद लाल पत्ते वाली , टेढ़े , मेढ़े गोभी भी उगाये जाएंगे .
खैर, विज्ञान की ललक भरी दौड़ और पहुँच बेशक कहाँ से कहाँ तक पहुंच गई है तो सोच कर विश्वास नहीं होता है--और देखकर विश्वास भी करना होता है.
मैं ,अभी अपने लिखे संसमरणों के पन्नों को टटोल रही थी और आँखों के सामने नीले ,पीले , सफ़ेद ,गुलाबी ,वाली घास बिछ गयी और स्कूल की बाउंड्री पर नीले ,नीले गुब्बारे नुमा फूल लटकते नजर आने लगे .
कब तक ऐसी हरी घास रंग बिरंगे फूलों वाली बिछ जायेगी ,चाँद की माटी पर --एक प्रश्न हमेशा ही
उग आयेगा कुकुरमुत्ते के फूल जैसा .
चलिए--इंसान अपने आस्तित्व की कोशिकाओं में खोजी जींस लेकर पैदा होता है सो खोज जारी रहेगी उसके आस्तित्व के साथ.
चार ,पांच दशक पहले तक हम प्रकृति को इस तरह आत्मसात करते थे जैसे कि वह हमारे जीने के लिए आक्सीजन हो .
आस ,पास फैली सोंधी माटी पर ना जाने कितने तरह की घास यूं ही बिछ जाती थी और उस घास पर उगे छोटे ,छोटे नीले,,पीले ,सफ़ेद ,गुलाबी फूल हमारे तलुवों को छूते रहते है.
ना जाने कितने फूलों को हम जाने अनजाने कुचलते जाते थे फिर भी ओस में भीगे वो फूल तलुवों को अपने प्यार से सिक्त करने से नहीं चूकते थे .
उन्हें कुचल जाने पर भी कोइ मलाल नहीं होता था--दूसरी सुबह उनकी जगह उतने ही फूल सुबह की कच्ची धुप में मुस्कुरा रहे होते थे .
दीवारों व पेड़ों की मोटे , मोटे तनों से लिपटी बेलों पर लदे ,फदे नीले ,नीले गुब्बारेनुमा फूल जिन्हें हम तोड़ कर गुब्बारों की तरह फुला कर फट,फट कर के फोड़ते रहते थे.
उंगलियाँ हमारी नीली ,नीली हो जाती थीं .
वो फूल अपनी स्मृतियों को हमारी उँगलियों की पोरों पर छाप जाते थे.
और वो स्मृतियाँ अभी भी मेरे पास हैं क्योंकि स्मृतियाँ तभी मरती हैं जब स्मृतियों वाली उँगलियों के वजूद मिट जाते हैं.
आज कितनों के पास होंगी वो स्मृतियाँ नीले ,नीले पोरों वाली ?
रंग ,महक ,स्व्वाद से सरोबार है आस्तिव ,लेकिन हम जीते हैं ,पत्थरों की तरह .

Wednesday, 17 August 2022
साधारण होने का चमत्कार
झेन गुरुओं की एक अनूठी परंपरा रही है बुद्ध के समाकालीन जो मुख्यत जापान में
आइये एक छोटी सी कथा के माध्यम से उनकी धारणाओं को साधारण होने की कला के चित्र को निहारें,कुछ पल------
एक दिन झेंन गुरू बांके अपने कुछ शिष्यों के साथ नदी किनारे बैठ कर कुछ चर्चा,परिचर्चा कर रहे
थे,उसी समय दूसरे पंथ के एक गुरू वहां आए और शेखी बघारने लगे---हमारे गुरू नदी के इस पार हाथ में ब्रश लेकर नदी के उस पार खड़े आदमी के हाथ में लिए केनवास पर चित्र बना सकते हैं,
आप क्या कर सकते हैं क्या कोई ऐसा चमत्कार कर सकते हैं ?
झेंन गुरू बांके ने सहजता से उत्तर दिया----
मैं तो केवल एक चमत्कार जानता हूँ , जब भूख लगती है खाना खा लेता हूँ ,जब प्यास लगती है पानी पी लेता हूँ, जब नींद आने लगती है, सो जाता हूँ.
कोइ साधारण होना नहीं चाहता . उसका अहंकार उसे साधारण होने नहीं देता.
ओशो से उद्धारित एक झेन कथा.
Monday, 15 August 2022
खुद को निश्चिन्त रखिये-----
आदतन नींद सुबह जल्दी खुल जाती है यदि रात को अपने नियत समाय पर सोना हो जाए और नींद क्रम सुचारू रूप से करीब तीन घंटे, दो घंटे, एक घंटे के क्रम से पूरा हो जाए.
रोजमर्रा केवल श्रम वाले कार्य नहीं होते हैं कुछ काम मानसिक स्तर पर भी करने होते हैं.
जैसे जरूरी कागजातों को क्रमबंध करके सही स्थान पर रखना ताकि, समय पर सही स्थान पर मिल जाएं.
साथ ही उन कागजातों को पुनः उसी क्रम में,उसी स्थान पर उसी योजनाबद्ध तरीके से रखने की स्वतः कृत आदत बनी रहे .
यदि कभी किसी कारणवश इस क्रम को,इस योजना को बदलना पड़े तो आवश्यक है इसे क्रमवार मस्तिष्क के डेस्टोप में ,स्मृतियों की फाइलों में क्रमबद्ध तरीके से स्टोर कर दिए जांए.
और, उनकी कोडिंग करके , शांत मन से,स्थिर शरीर से दोहरा लिया जाए.
शारीरिक श्रम के कामों को तो हम प्रतिदिन करते ही रहते हैं और आदतन उसी क्रम में करते चले जाते हैं .
और,
कभी कोइ काम आगे,पीछे हो जाए या कम हो जाए,या कि, बिगड़ जाए तो ज्यादा से ज्यादा कुछ समय का नुकसान हो जाता है या कि,सामान का.
समय तो हमारे पास वैसे ही पडा रहता है और रही सामान की बात तो हमारा दार्शनिक भाव इन सबको को---दुनिया आनी जानी,सब कुछ भ्रम है,के सत्य की पुडिया बना कर फांक लेता है.
लेकिन जरूरी दस्तावेजों,चाबियों, A T M card आदि के मामलों में स्थिति भिन्न हो जाती है यदि वे समय पर और उसी जगह पर ना मिलें.
ऐसी स्थिति में केवल मानसिक दवाब ही नहीं बढ़ता है शारिक व्यवस्था भी चरमराने लगती है.
भूख कम हो जाना, नींद का ना आना , क्रोध जो कि खुद पर कम दूसरों पर अधिक आने लगता है, और व्ववहार का बेतुका हो जाना. और भी सईड एफेक्ट हो सकते हैं निर्भर करता है व्यक्ति पर और उसके हालातों पर.
इसी सन्दर्भ में ,मैं एक घटना का जिक्र करना चाहूंगी.
कुछ कारणों से अधिकतर समय मैं अकेले ही रहती हूँ. अधिक सूरक्षा की हीनभावना के कारण सभी कमरों में ताले लगा लेती हूँ जब सोने जाती हूँ.
एक रोज सुबह जब उठी तो अन्य कमरों की चाबियाँ उस स्थान पर नहीं मिली जहां उन्हें रखती थी.
नींद पूरी तरह खुल भी ना पाई थी,शारीर भी चैतन्य ना हो पाया था मगर दिमाग तेज रफ़्तार काम करने लगा-----
ताले तुड़वाने पड़ेंगे
ताले बेकार हो जाएंगे.
नए तालों का खर्चा कितना होगा.
अभी Lock Down में कौन आएगा.
अगर कमरे बंद पड़े रहे तो घर कैसा लगेगा.
वगैरह,वगैरह---
ऐसी स्थितियां सभी के साथ,कभी ना कभी आ ही जाती हैं अब और ऐसी स्थिति से कैसे निबटते हैं---
मैंने उन दिनों कुछ नया सीखा जो कभी किताबों नहीं पढ़ा था ना ही किसी ने पढ़ाया .
अब पता नहीं कागजों की डिग्रियां कागज़ के शेरों के समान किसी फाइल में लिपटी पीली पड़ गयीं होंगी.
इस कुचक्र से निकालने के लिए---
सबसे पहले खुद को लताड़ा--बेवकूफ, इसा घर में तुम्हारे अलावा कोइ और रहता है क्या?
भूत प्रेत भी आ गए हों तो वो क्या करेंगे इस कचरे का ?
चोर अगर आ जाते तो ताले तो वैसे ही खुले मिला जाते.
सिलसिलेवार १---
१. स्वमं से वार्तालाप
२. खुद को लताड़ना
३. खुद को भरोसा देना--मैं हूँ तो जहां है.
४. इससे पहले कितनी बार ताले तुदवाए ?
५. Lock Down कभी तो खुलेगा .
सिलसिलेवार २----
१. एक गिलास गुनगुने पानी में जोली तुलसी की १०,१२ बूंदे डाल कर आँखों को मूंदे सिप,सिप कर आनंद लेने लगी.
२. गैस पर उबलती चाय को बड़े से मग में छान कर गहरे सोफे में समा कर अखबार के कुछ पन्ने पलटे तब तक चाय पीने लायक ठंडी हो गयी.
३. टोस्ट के डिब्बे में से एक टोस्ट निकाल कर कुतरने लगी .
४.आनंद में डूबी ,अचानक हाथ बालों तक चला गया और आदतन खुजाने लगी.
५.सोचा ज़रा कंघी से बालों को ठीक कर लूं--
६. तुरंत चाबियों का गुच्छा मेरी नज़रों के सामने पडा था.
७. क्योंकि, एक कंघी बाथरूम के सिंक पर रखलेती हूँ,सुविधा के लिए.
८. मैं सिंक तक पहुँची भी ना थी और मुझे मेरी चाबियाँ मिल गयीं.
यह मस्तिष्क सब कुछ स्टोर किये रहता है बस हमें सही कोडिंग करनी होती है .
http://
Friday, 12 August 2022
आदमी एक बीमारी है अपने आप में क्योंकि, वह अधूरा पैदा होता है-----
आदमी पूरा पैदा नहीं होता है . आदमी जन्म का अधूरा है .
सब जानवर पूरे पैदा होते हैं. आदमी अधूरा पैदा होता है. वह जो उसकी पूरा होने की स्थिति है इसलिए यह उसकी डिसीज है. वह इज में नहीं है इसलिए वह चौबीस घंटे परेशान रहता है.
ऐसा नहीं है, आमतौर से हम सोचते हैं कि, एक गरीब आदमी परेशान है,क्योंकि,
गरीबी है.
लेकिन हमें पता नहीं है,कि आमीर होते ही से परेशानी का तल बदलता है, परेशानी नहीं बदलती है.
सच तो यह है कि, गरीब इतना परेशान होता ही नहीं है जितना अमीर परेशान होता है.
क्योंकि, गरीब के पास एक जस्टीफिकेशन है कि उसकी परेशानी का कारण उसकी गरीबी है,अमीर के पास ऐसा कोइ जस्टीफिकेशन नहीं इसलिए उसे समझ ही नहीं आता कि वह परेशान क्यों है.
और जब परेशानी अकारण होती है तो परेशानी भयंकर होती है.
जैसे किसी बीमारी का स्पष्ट कारण पता चल जाता है उसका इलाज भी समझ में आ जाता है,और इलाज किया जा सकता है.
हालांकि,मैं पसंद करूंगा गरीब के दुःख की बजाय अमीर का सुख ही चुनने योग्य है.
जब दुःख ही चुनना है तो अमीर का दुःख ही चुनना चाहिए, लेकिन बैचेनी की तीव्रता बढ़ जाएगी.
ओशो के विचार,सादर के साथ.
Sunday, 7 August 2022
हम तो सुकड़ रहे हैं ,हमारे मन के आँगन कहाँ खो गए -----प्रभु
वैसे तो बदलाव जीवन की रीत है. दुनिया घूम रही है अपनी धुरी पर सूर्य भगवान को छोड़ सभी ग्रह घूम रहे हैं.पूरी कि पूरी कायनात घूम रही है फैल रही है,सुकड रही है?
हम हथियार बना रहे हैं,खरीद रहे हैं,बेच रहे हैं,लड़ रहे हैं, लडवा रहे हैं.
दो बरस पहले एक त्रासदी से गुजर कर जो लोग बच गए वे सामाजिक त्रादसी में फँस चुके हैं.
शायद हम ऐसे समय के मोड़ पर आ गए हैं जहां कोइ ना कोइ त्रासदी हमें घेरे रहेगी,ना जाने कब और कैसे कौन सी त्रासदी बिना आहट हमें सामूल निगल जाय,जिसे कहने और सुनाने को कोइ आसा,पास भी ना हो.
कोरोना के बाद तुरंत ही हम सामाजिक त्रादसी में घिर चुके हैं.स्वम पर विश्वास नहीं रहा,औरों पर विश्वास टूट गया और भगवान भी विश्वास के काबिल नहीं बचा.
जब भगवान ह्रदय के मंदिर से निकल कर बाजारों में भटकने लगे,जब वो इतना कमजोर हो जाएं कि वो अपनी साख को भी ना बचा पाए ,लोग उसके नाम पर अमानुष हो जाएं तो भगवान की धारणा भी खोखली है.
ऐसे ही जैसे भगवान कमजोर हुए वैसे ही मनुष्य भी रीढ़ की हड्डी के बगैर हो गया.
रिश्ते तो ऐसे धुल धूसिर हुए कि, उन्हें नाली में गिरी चवन्नी की तरह ढूँढने के सामान हालात हो गए.
अब अगर नाली में गिरी चवन्नी अगर ढूंढ भी ले तो नाली की बदबू तो बनी रहेगी. उस चवन्नी को ना तो मुट्ठी में रख पाएँगे ना ही जेब में.
रिश्ते नाते ना हुए गोया कैंची हो गयी कतरते रहो एक, दूसरे को.
मंहगाई तो सत्तर सालों से देख रहे हैं शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब हमने मंहगाई का रोना ना रोया हो,आज भी रो ही रहे हैं.
लेकिन मंहगाई,मंहगाई में फर्क जरूर है .दस,बीस बरस पहले की मंहगाई के दौर में जब कभी मेहमान या नाते,रिश्ते वाले आ जाते थे थाली में एक दो कटोरी का इजाफा हो ही जाता था. रोटियाँ गिन,चुन कर नहीं बनती थीं वरन गाय वा कुत्ते की रोटी भी याद से बनती थी.
धीरे,धीरे हमारे मन सुकडने लगे कटोरियों का इजाफा कम हो गया रोटियों की गिनती होने लगी घर की गृहणी के ललाट पर लाइनें दिखने लगीं.
बड़ी जल्दी वह दौर भी आ गया माथे की लकीरों ने होठों की मुस्कराहट भी समेट ली.
और,अब तो साहब अगर बुलाना बहुत ही सामाजिक हो जाए तो पहले तो बामुश्किल बुलावा आ जाता है मोबाइल से लेकिन दो घंटे बाद ही मोबाइल की घंटी बज उठती है---सोरी, बूआ जी ऐसा है हमारे पड़ोस वाले घर में मरम्मत का काम चल रहा है हमारी बालकनी घिरी पडी है,अब आप १०,१५ दिन का प्लान बना लीजिये.
पड़ोस के घर की मरम्मत से मेरे आने का मेलजोल,समझ के परे है.
दूसरी बात राखी का त्यौहार ४ दिन बाद है १०,१५ दिन बाद जाने का क्या प्रयोजन ?
खैर,आज की मंहगाई ने लोगों के दिलों को इतना सिकोड़ दिया है कि,हम आत्मविश्वास से रीत गए गए हैं.
यहाँ तो एक प्रकरण हैं ऐसे ही कई रूपरेखाएँ देखने को मिलती रहती हैं.
मुझे लगता है पहले लोगों के घरों के बजट में मेहमान और त्यौहार दौनों ही शामिल हुआ करते थे.
दूसरी बात पहले की गृहणियां ज्यादा समर्थ थीं घर,रसोई,और नाते रिश्तों को सहेजने में.
अब की मंहगाई में सोशल मीडिया का जहरीला स्वाद मिल रहा है और इस तड़के ने रिश्तों के स्वाद बिगाड़ दिए,.
अब रसोई पकती नहीं है,अब जोमोटो वाले दरवाजों की घंटियाँ बजाते है.
हमारे घरों के आँगन तो ना जाने कहाँ चले गए--
मनों के आँगन भी खो गए.
Thursday, 4 August 2022
बचुवा ---पहले अपना घर बुहालीजो
Tuesday, 26 October 2021
मनुष्य एक बीमारी है---
मनुष्य एक बीमारी है. मनुष्य को छोड़ कर और कोइ पशु पागल होने की क्षमता नहीं रखता है.
कोइ पशु ह्त्या नहीं करता , आत्महत्या नहीं करता.
यही उसकी खूबी भी है ,यही उसका दुर्भाग्य भी है.
इसी रोग ने मनुष्य को सारा विकास भी दिया क्योंकि, इस रोग का मतलब है, हम जहां हैं,
वहां राजी नहीं हो सकते.
एक कहानी से इसा बात की शुरूआत करते हैं और समापन भी करते हैं.
एक पागलखाने का परिदृश्य यूं चल रहा है---
एक कठघरे में एक पागल सींकचों में बंद है, एक तस्वीर को अपने सीने से लगाए हुए ,कुछ गीत गा रहा है.
पूछने पर पता चला--कि, इसको किसी स्त्री से प्रेम था वो इसे मिला नहीं पाई और यह पागल हो गया.
दूसरे सींकचे में बंद दूसरा पागल सींकचों में सर मार रहा था,जोर,जोर से रोये चला जा रहा था.
पूछने पर पता चला--इसको वही स्त्री मिल गयी जो पहले पागल को नहीं मिल पाई थी.
आदमी सब बीमारियों से मुक्त हो कर भी ,आदमी होने की बीमारी से मुक्त नहीं हो पाता.
ओशो से लिया गया, साभार सहित.
Monday, 25 October 2021
पीले फूलों वाला घर
घर बे-आवाज , बे- जान अहसास नहीं है.
एक, एक कोना बोलता है.
एक,एक खिड़की को इंतज़ार है कि, अब खुले कि, कब कोइ पास खड़ा हो किसी के इंतज़ार में कि, दरवाजे भी आतुर रहते हैं, खुलने के लिए.
किसी का इंतज़ार , उन्हें भी है ,और वो पीले फूल महकते हैं, किसी के लिए.
मैं, पीले फूलों वाला घर हूँ .
पूरब के कोने में
तुलसी का बिरवा है
बिरवे में दीये का साया है
साए में जीवन की गाथा है
मैं, पीले फूलों वाला घर हूँ.
घर की दीवारें पीली हैं
दीवारों पर लाल कंगूरे हैं
लाल कंगूरों से लिपटी
अंगूरों की बेलें हैं
मैं, पीले फूलों वाला घर हूँ.
साँसों के अहसास भरे
घर में कुछ कमरे हैं
एक कमरा खाली है
एक साया अहसासी है
मैं, पीले फूलों वाला घर हूँ.
दीवारों से सिमटे
जाली के दरवाजे हैं
दरवाजों से सिमटी आँखों में
सिमटी, कल की आशाएं हैं
मैं, पीले फूलों वाला घर हूँ.
Thursday, 21 October 2021
कुछ स्वर्ग
कुछ स्वर्ग--
जेबों में पड़े
खोटे सिक्कों की तरह
कुछ देर ही
खनकते हैं,बस--
कुछ स्वर्ग----
यादों में बस
ता- उम्र---
रहते हैं,हमसफ़र!!!
आइये, दशहरा चला गया, दीवाली को कह कर----
जल्दी से पहुँचना लोगों की जिन्दगी में,अन्धेरा ज्यादा ना घिर आए कहीं.
घर,घर दीप जला देना,स्वाद मिठाइयों के भर देना सबके मुंह में,,क्योंकि बहुत अन्धेरा घिर आया था, कुछ और ज्यादा उजाला ले कर जाना ,इस बार, कुछ और ज्यादा मिठास भर देना जिंदगियों में, धन्यवाद.
आइये, याद करते हैं--साथ,साथ उन दशाहरों को, उन दीवालियों को---
दशहरा जब आता था---
गली, मोहल्ले ,नुक्कड़, नुक्कड़
सीता, राम,लखन भय्या
उनके साथ भक्त हनुमान
रावण ,कुम्भकर्ण का वध करने
ले अवतार ,प्रगट हो जाते थे.
जब, तरकश से बाण छोड़
दुर्जन पर करते थे,वार, राम
तब,---
एक, एक वार पर
होते थे , लख , लख
उदघोष ,राम .
अभी,---
दशहरा विदा हुए नहीं, घरों से
लडियां दीवाली की
टंक गयीं ,घरों में
मिट्टी के छोटे, छोटे दीयों में
लगीं दमकने
भीगी बातीं , तेलों में.
घर , घर , रिश्तों , नातों का
आना, जाना रहता था
बेसन के लड्डू और इमारती
घर , घर, थाला सजातीं
थाल भरा, मिठाई का
भर , भर, खाली होता था.
अब--- दृश्य बदल गए हैं.वक्त जो आगे चला गया.
दूर खडी पांत समय की
लगती है,इन्द्रधनुष सी ,क्यूं?
आज---
धूप ,चांदनी सी, जीवन की
लगती , अंगारी सी क्यूं?
एक ,धूप का फैला आँचल
कर जाता---
मन को घायल ,क्यूं?
एक , धूप बबूल कटीली सी
बन जाती , मां का आँचल ,क्यूं?
मेरी पुस्तक-- बिखरे हैं , स्वर्ग चारों तरफ---से चुनी गयीं ,कुछ पंक्तियाँ.
आशा है,,पसंद आएंगी.
Monday, 18 October 2021
' जिन्दगी '--एक बात छोटी सी-----
' जिन्दगी ' को जितना खींचो,खिचती चली जाती है.
और, एक कप में चाय कुनकुनी भर लें, फूँक,फूँक कर पी लें
तो, जिन्दगी एक कप में सिमिट आती है--'जिन्दगी'.
' जिन्दगी'
एक आहट है आने की एक आहट जाने की,छोटी सी.
बीच का तामझाम तो बस चाय का खदकना भर है.
चलें---
'जिन्दगी' एक बात छोटी सी--
एक आहट है
आने की
एक आहट है
जाने की, छोटी सी
जिन्दगी.
धुंध के आगोश में
सिमिट जाती हैं,कायनातें
तब, ' तू ' याद आता है,मुझे
कुछ इस तरह,यूं.
शिकायतों की उलझनें
उम्मीदों के मकडजाल,और
हम, कैद हैं
ना-उम्मीदी की कैद में.
क्यूं?
जो--
एक प्याली चाय पी,तेरे साथ
फूँक,फूंक कर--
बस,
इसी गर्माहट में तर
मेरा हो,एक और कल.
और---
एक प्याली और ,
खदकती रहे,चूल्हे पर
' तेरे ' इंतज़ार में.
' जिन्दगी '--
एक बात छोटी सी
प्याली में उडेलना
फूँक, फूँक,घूँट,घूँट
पी लेना,भर है.
' जिन्दगी ' एक बात छोटी सी.
Sunday, 17 October 2021
कोई तो है---
१. हम एक प्रोग्राम हैं जो किसी अदृश्य कमप्यूटर पर डाउन लोडेड हैं.
२. 'कौन' है वह जो हमें कोड़ा-डिकोड-डिलीट कर रहा है?
३. क्यों कर रहा है?
४, जिस यन्त्र पर कर रहा है वह कैसा दिखता है--
विशाल, सूक्ष्म, अदृश्य ,माया,अमाया या कि, जादू की पुडिया?
हम सभी के मन में ऐसे विचार कभी ना कभी उठाते रहे होंगे,समुद्र की लहरों की भांति--
क्योंकि, हम सभी एक ही महासागर की उठती, गिरती लहरें हैं.
दूसरा पन्ना पलटते हैं--
१. यह निश्चित दिखता है--हम सब बुद्ध नहीं हो सकते और एक से अधिक भी नहीं हो सकते.
२. यह भी निश्चित दिखता है कि--हम सभी अंगुलिमाल भी नहीं हो सकते हैं वह दस्यु जो मानव-ह्त्या
कर उनकी अँगुलियों की माला गले से उतार कर ---बुद्ध के चरणों में बैठ सका.
हममें से कई भी अंगुलिमाल नहीं हो सकते हैं.
मैंने स्वम से पूछा----अशोक के सन्दर्भ में---
१. जब इतना विशाल साम्राज्य था तो,कलिंग पर आक्रमण क्यों?
२. बुद्ध की शरण में आना था तो सीधे रास्ते चल कर क्यों ना आ गए--अशोक?
मैंने स्वम ही अपने प्रश्नों के उत्तर यूं दिए---
१. जब तलक विनाश लीला ना होगी, सृजन ना होगा कभी.
२. 'बीज' चाहे कर्म का हो या विचार का, बगैर तपिश ,बगैर अन्धकार के फूटते नहीं हैं.
तभी, सत्कर्म के फूल खिलते हैं.
पुण्य के विचार महकते हैं.
१.
.jpg)













