Tuesday, 7 September 2021

                                        

                                            बिखरे हैं-- स्वर्ग  चारों तरफ

अक्सर जीवन में बहुत कुछ,बहुत ख़ूबसूरत बंधी मुट्ठी से  यूं सरक जाता है कि,

 हम उसकी आवाज भी नहीं सुन पाते हैं--और पास फैले इन्द्राधानुष को दूर कहीं क्षितिज में, उसे  पाने की कोशिश करते रहते हैं.

क्या अपनी छट के साए में जी पाना स्वर्ग नहीं है?

क्या दो पहर सम्मान का भोजन मिला पाना स्वर्ग नहीं है?

क्या दो व्यक्तित्व अपनी,अपानी निजता को साधे हुए एक होकर जीवन यात्रा में सहयात्री हो पाएं--स्वर्ग नहीं है?

क्या,

घर में बच्चों की किलकारियां को वयस्क होता देखा पाना स्वर्ग नहीं है?

और--हम उम्र के उस पड़ाव तक पहुंच पाए हों-कि, वंश के तीसरे पायदान पर खड़े हो उनकी साज-सवांर में अपना भी योगदान दे पा रहे हों--बेशक अपनी मौजूदगी का--स्वर्ग नहीं है?

बचपन  की कुछ बेहतरीन यादें हमारे पास हों,जिन्हें याद करके हम मुस्कुरा उठे हों,जब,

कभी,स्वर्ग नहीं है ?

और--इन स्वर्गों को शब्दों में उतार पा रहे हों--स्वर्ग नहीं है?

मूल्याकन नहीं किया जा सकता--इन स्वर्गों का.


मेरी कृति, "बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ"  से चुनी गईं कुछ पंक्तियाँ.













Sunday, 5 September 2021

मन की बात




                                                         https://youtu.be/LIQQLjfKnOM

Thursday, 26 August 2021

धवल हंस किसका

                                              धवल  हंस किसका---

नैतिक शिक्षा एक विषय हुआ करता था , कुछ दशक पहले तक  प्राथमिक  पाठों में

एक कहानी--हंस किसका --शीर्षक से.

कहानी दो राजकुमारों की है जो आपस में चचेरे भाई थे. बडे राजकुमार जिनका नाम  सिदधारथ था और छोटे भाई का नाम देवदत्त.

सिदार्थ  शांत भाव वा कोमल ह मन वाले जिनके  मन  जीवों के लिये करुणा से भरा था  इसके विपरीत देवदतत आखेट के शौकीन  तीर-कमान उनका मनपसंद आखेट था . सो अपने बागीचे में जब भी विचरं करने जाते अपने आखेट के शौक को अवश्य  पूरा करते..

ऐसे  एक अवसर पर देवदत्त ने अपने आखेट की रुचि को पूरा करते हुए आकाश में विहार करते हुए एक धवल हंस पर अपने कमान से तीर साध दिया. उस निरीह प्राणी के शरीर में वह तीर बिंध गया  और कुछ क्षण में वह धवल हंस घायल हो जमीन पर आ गिरा.

सौभागयवश--घायल होकर वह बडे राजकुमार सिदार्थ के पैरों के पास आ गिरा

पीडा से छटपटाता हुआ आंखें खोले राजकुमार की ओर अपनी चोंच उठाए मूक जीव राजकुमार को निहारे जा रहा था.

राजकुमार ने उस घायल हंस को उठा कर अपनी गोद में रख लिया और अपने कोमल हाथों से सहलाते हुए उसके घाव को साफ करने लगे.घायल हंस के घाव पर औषधि का लेप कर दिया.कुछ समय बाद वह घायल हंस ठीक हो उठा और अपनी चोंच को आकाश की ओर उठा कर कुछ कहने का परयास करने लगा--मानों कि, '"उसको"  को धनयवाद दे रहा हो, हंस की आंखों में आभार का गंगाजल बह रहा था

राजकुमार ने एक बार पुनः हंस को अपनी कोमल हथेलियों से सहलाते हुए धीरे से उसे आकाश की ओर उडा दिया--

नीले आकाश में धवल हंस अपने दौनों पंख फैलाए उड चला था और रजकुमार सिदधारथ मंद गति से अपने महल की ओर लौट चले.

आशा है-- इससे आगे की कहानी हम सबने पढी वा सुनी अवशय है और हो सकता है 

अब,इस संदरभ से आगे--

हंस की पीडा आखेट से आगे निकल कर,मनोरंजन पर आ टिकी है और इससे भी आगे जा कर इनसानी भूख से होते हुई जिवहा के आगरह पर तब  ठहरती  है --जब मूक निरीह जीवों की पीडा अकलपनीय,असहनीय परिदरूशय को बयां करती हैं  जो बयां हो नहीं सकती केवल शबदों में--केवल अहसास की कलम औरजब करुणा की सयाही में भीग कर दिल के पननों पर लिखी जाए

दूसरा आगरह--

इनसानी  सेहत और इनसानी संतति को और अधिक पुषट करने के लिये हमें उचच कोटि का  भोजन चाहिये होता है जो कि मूक पशुओं के माधयम से  मिलता  है अतः इसके लिये एक विषेश  तरह के अनाज को  खास  तरीके  से उगाया जाता है जिसे इन पशुओं को आहार के रूप में दिया जाता है.

अंततः इनके शरीर के जरिये हमें  उचचतम आहार मिल जाता है 

हमारी बातों के भी खंडन  होते रहते हैं ,,होते रहे हैं,और होते रहेंगे

गैर-जरूरी  बातों में ना जा कर-- बात एक ही  जरूरी  हैकि   पीडाओं के आधार पर  कया कोई सुख,सुकून  की  कलपना  की जा  सकती है?

एकजिसटेंस एक  ऐसी  दीवार है जिस पर जो  फैंका  जाये  वही वापस लौट आता है.

सहासतितवऔर सहसंरकशण के बगैर हमारा आसतितव  भी खोखला है.

कुछ अहसास मानवीय  हैं  वरन वे  एकजिसटेनशियल वा  एजेंशियल भी हैं जिनहें कायम रखना हमारा मानवीय कारण बनता है साथ  ही खुद को मिले  जीवन के  लिये आभारित होने  की   जरूरत है साथ  ही औरों के साथ हमारा  जीवित रहना  मेईनिंग रखता है--- हम हैं तो वे  भी हैं,वे  हैं तो हम  भी हैं

अहसास  जीने  का--- अहसास  जीने  देने का एक ऐसा अहसास है,कि--- बस एक बात को दो तरह से कहने भर का  अनदाज  है

अहसासों को  जिंदा रखिये .





 

Thursday, 19 August 2021

सुख--सुविधाएं---

कुछ दशक पहले तक दिन में कई,कई बार बड़ों के पैरों तक झुकना होता रहता था--कई,कई बार आशीर्वाद भी मिल जाते थे.

अब ना झुकना होता है बड़ों के पैरों तक ना ही आशीर्वाद मिलते हैं, खुश रहने के.

शब्दों में भी शक्ति होती है,हर शब्द की अपनी ऊर्जा होती ,जैसे शब्दों के भाव होते हैं ,वैसी ही उनकी ऊर्जा आस्तित्व में फैल जाती है.

लेकिन,

अब सुख,सुखी शब्दों की ऊर्जा चूक गयी है क्योंकि,उनके इस्तेमाल कम हो गए हैं या कि, ना ही हो रहे हैं.

मशीन भी बगैर इस्तेमाल के जंग खाने लगती है.

असल में,सुख भी सुविधाओं के बीच  में घिर कर बे-असर हो गया है.

हम भी सुविधाओ को सुख मानने लगे हैं.

घर बेजान सामानों से बोझिल होते जा रहे हैं,घरों की दीवारें खो रहीं अपनी,अपनी सीमाओं में.

कितने भी बड़े घर क्यों ना हों वे रहने वालों के लिए छोटे होते जा रहेहैं.

सामानों से टकराए बगैर एक कमरे से दूसरे कमरे तक पहुँचना ब-मुश्किल है.

कुछ दशक पहले तक दो कमरों का घर अच्छा खासा बड़ा घर माना जाता था.

 घर का एक कमरा पुरुष सदस्यों के लिए,एक महिलाओं वा बच्चों के लिए पर्याप्त होता था.

साथ में बरांडा ही आल परपज जगह होती थी,जहां  सब कुछ सिमट जाता था,जो कहीं और ना समेटा  जा सके.

और,घर का आंगन तो घर की आन,बान वा शान हुआ करती थी,जहां तुलसी का विरबा अपनी पवित्रता को चौबीस घंटे बिखेरता रहता था.

आँगन के एक तरफ फुलवारी के लिए भी जगह निकल आती थी,जहां बच्चे,बड़े,बुजुर्ग अपनी,अपनी पसंद की फुलवारी लगाते ही रहते थे.बारिश के मौसम में कुछ अधिक ही प्रयोग चलते रहते थे,जहां से जो मिला रोप दिया बगीची में.

हाँ जी,, बात हो रही थी सुख,सुविधाओं की,सो शाम ढलते ही चारपाइयों की कतारें बिच जाती थीं.बैठक में पुरुषों की और वयस्क लड़कों की,मेहमानों की भी एडजस्ट हो जाती थीं,दो,चार, चारपाइयां.

सुबह की होन में बिस्तर सिमट जाते थे.हर घर में बड़े,बड़े संदूक होते थे उन पर एक के ऊपर एक बिस्तर चीन दिए जाते थे.कभी,कभी अनुपात से अधिक होने पर बिस्तर जमीन पर गिरते पड़ते रहते थे.

और,पूरा घर खाली,खाली सा हो जाता था,रोनकों के लिए जगहें हो जाती थीं.

अब,सुविधाओं की डस्टिंग करते,करते आधी से अधिक जिन्दगी धुल फांक रही है.कोइ आए या ना आए सुविधाएं हर समय करीने से घर के कोनों को घेरे पडी रहती हैं.

और--हम घर के सुखों को घर से डस्टिंग करके घर के बाहर फेंक देते हैं.

थोड़ा बोझ  हलका करना होगा सुविधाओं का ,अपनी जिन्दगी से.

थोड़ी जगह खाली छोड़नी होगी सुखों के लिए, घर के अन्दर आने के लिए.

और--

सामानों से ज्यादा प्यार हमें अपनों से करना होगा जो कभी,कभी ही आ पाते हैं.

अब तो कोरोना ने यह रिवाज भी खत्म कर ही दिया--

कौन किसके यहाँ जाए,या कि ,ना जाए.




Sunday, 15 August 2021

ग्रेनीज हाउस-----

पिछली बार जब मैं अपने छोटे बेटे के यहां सिडनी,आस्ट्रेलिया उनके परिवार के साथ कुछ वक्त गुजारने गयी हुई थी.

वहां का मौसम कभी,कभी ठंडा सा हो जाता है सो उनके बड़े से घर के पिछवाड़े बड़े सेअहाते में धूप सेंकने के लिए दिन में बैठ जाया करती थी.

करीब १०,१२ दिनों से खट,ख़ट की आवाज सुनती रहती थी जो बगल वाले घर से आती थी.

आवाज बड़ी लयबद्ध थी,कभी,कभी ध्यान लग जाने का सा आभास होने लगता था.

परन्तु एक दिन कौतहूलवश बेटे पूछ ही लिया--ये आवाज कैसी आती रहती है,बगल वाले घर से?

बेटे ने मुझे बताया कि, बगल वाले घर में ग्रेनीज हाउस बना रहे हैं.

मैं थोड़ा अचरज में पड़ गयी--जब पहले से ही इतना बड़ा घर है तो ग्रेनीज--दादी के लिए अलग से घर क्यों बना रहे हैं.

बेटे ने सहज भाव से कहा--मम्मी यहाँ इन देशों में ऐसा ही रिवाज है.ना तो बच्चे बुजुर्गों को अपने साथ एक ही घर में रखना चाहते हैं ना ही बुजुर्ग बच्चों के साथ एक ही घर में रहना चाहते हैं.

बात आई,गयी हो गयी.

इस बात को भी करीब तीन साल गुजरने को हो आए.

इस बीच कोरोना की एक,दो लहरें आईं और चली भी गईं,अब तीसरी की तैयारी चल रही है.

पानी बहुत सारा बह गया है.

हम सभी भी देखते,देखते बहुत कुछ,कुछ और होते जा रहे है.कारण कई हैं कुछ वास्तविक तो कुछ भय के कारण तो कुछ जीवन के प्रति भरोसा भी कम हो रहा है,हर दिन--सबसे बड़ी बात है.

खुद पर भरोसा तो चला ही गया है.

खैर-बात को ज्यादा लम्बी करना ठीक नहीं है से जो बात कहने की है--वह यह है--

अब,मुझे ग्रेनीज,ग्रेंद्पा वाली बात ज्यादा समझ आने लगी है.

हम अपने ग्रान्ड पेरेंट्स के साथ क्या कर रहें हैं, बहुत कडुवी सच्चाई है,जिसे देखते हुए भी हम नहीं देखना चाहते.

जिन्होंने हमारे लिए एक,एक ईंट जोड़ कर घर बनाए,बच्चों के मांगने से पहले ही उनको दे दिए,खुशी,खुशी. जोअपने घर के अगवाड़े में रहते थे,वे धीरे,धीर अपने ही घर के पिछवाड़े चले नहीं ,भेज दिए गए,जहां से उनकी आवाज अगवाड़े तक बमुश्किल आती है और जिसे सुन कर अक्सर उनसुनी कर देते हैं,अपने ही.

यहाँ बात थोड़ी गले उतर भी जाती पर  बुजुर्गों का स्व्वातंत्र,

उनका सम्मा.उनका अपना लहजा जीने का--सभी कुछ दांव पर लग जाता है महज कुछ वर्षों के लिए जो उनके पास शेष बचते हैं ५०,६०वर्षों की मेहनत,त्याग और ना जाने क्या,क्या गुजरा जाता है--

तब जाकर उन्हें ये सब कुछ मिलता है अपनों से.

ग्रेनीजा हाउस में बुजुर्ग बेशक थोड़ा एकेले अवश्य हो जाते हैं लेकिन कम से कम वे अपनी आजादी को अपनी बैठने,उठने की आजादी को कायम रख पाते हैं.हर समय बेफुजूल की टोका,टोकी से निजात पा लेते हैं.

बेशक--

उनकी आवाज अपनों तक थोड़ी देर में पहुँचती है लेकिन दिन में दो,तीन बार उन्हें सुनने पहुंच तो जाते ही हैं उनके अपने.

हमारे बुजुर्ग कमरों से कमरे सटे हुए में रहते हैं फिर भी उनकी आवाज एक ६इंची दीवार को भी पार नहीं कर पाती है.

यह मेरे विचार हैं.

उनके ग्रेनीज हौसा बेहतर हैं,हमारे पिछवाडॉ से.





Tuesday, 3 August 2021

                                      

                                     संवेदनशीलता बनाम  असंवेदनशीलता-----

करीब ४०,५० वर्ष के छोटे से अंतराल में हमारी सामाजिक,आर्थिक वा  पारिवारिक प्रारूप में जो

 दुखद वा असंवेदनशील परिवर्तन देखने को मिलते हैं और लगता है हमारी जिंदगियों को विषधर नागों

 की भांति जकदते जा रहे हैं,हमारी जीवन से हर रस को निचोड़ रहे हैं,हम नासर्गिक सौंदर्य से चिटक रहे हैं.

सुविधाओम को हमने सुख समझ लिया है,मशीनी जिंदगियों के मुहताज हो मशीन होते जा रहे हैं.

संवेदनाएं कहीं खो गयी हैं,उनके के साथ,साथ हम भी खोते जा रहे हैं.

परिवार का ढांचा ऐसे बदल गया है जैसे कोइ धोबी घात पर पीट,पीट कर निचोड़ा लाया हो

परिवार के नाम पर सब कुछ चिथड़े,चिथड़े हो गया है.

५०,६०,७०तक के दशकों तक परिवार बगैर दादी,दादाजी,के पूरा ही नहीं होता था.

परिवार मानों एक पिरामिड हुआ करता था रिश्तों का एक ही घर में.

और इंसानी वजूद के अलावा घर में पालतू एक,दो कुत्ते,बिल्लियां जो कहीं से भी आकर घर को

 स्वाधिकार से अपना घर बना लेती थीं और कालांतर में हर सालएक,दो बार उनके नवजात बच्चे घर में

 धमाचोकदी करते रहते थे,अक्सर दूध में मुंह दाल ही देते थे,लेकिन कोइ बड़ा मामला नहीं बनाता

 थाजब अपीढ़े पर बैठीं दादी जी का आदेश आ जाता था--जब मुंह दाल ही दिया है तो पी लेने दो.

संदर्भ से आगे--एक वाकया का जिक्र करना चाहूंगी.

जिन दशकों की बात कर रही हूं,तब स्कूलों की गर्मियों की छुट्टियां पूरे दो माह की हुआ करती थीं.अक्सर बच्चे इन लम्बी,लम्बी छुट्टियों में अपनी दादी या नानी के गांव चले जाया करते थे,साथ में माता,पिटा का जाना जरूरी नहीं होता था.

एक और बात थी बच्चों को इतने लम्बे समाया के लिए दादी,नानी के संपर्क में चोदने का कि बच्चे कुछ संस्कार सीखा सकें उनके साथ रह कर और साथ,साथ दादी,नानी को अपने नाती,पोतों के साथ वक्त मिला जाया गुजारने के लिए.

दादी,नानियों के चूल्हे कभी बुझाते नहीं थे या कि,यूं कहा लें उनके चूल्हे ठंडे नहीं होते थे जब बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में उनके पास पहुंच जाते थे.

क्या खाएंगे,

कब खाएंगे बच्चे इन सब बातों का कोइ ओचित्य नहीं था.

गाम्वोम में शामें जल्दी घिर आतीं थीं,बमुश्किल एक लालटेन और एक,दो मिट्टी के तेल की कुप्पियाम होतीथीं जो हाथ में लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना हो पाटा था,घरों में.

तेल की कुप्पी को संभालना बड़ा मुश्किल का काम था एक हाथ में कुप्पी और दूसरे हाथ से कुप्पी की ओत रखनी होती थी ज़रा सी हवा चली नहीं और कुप्पी फक्का से बुझ जाती थी.

तब दादी,नानी कीपुकार लग जाती थी--आरमीना,अरेमंजू ज़रा माचिस लाना--अरे,लाली वहीं खडी रहना डरना नहीं,किसी से टकराना नहीं---

निर्देशों की लादियामपिरोई जाने लगतीं,लेकिन इसा दौरान उस कुप्पी वाली की जो हालत हो जाती थीथी--यह सोच करकि,चूहे,बिली,कुत्तेजो घर के सदस्य होते थेमगर एक और सदस्य हमारे आत्मीय सहचर,सर्पदेवता कहीं से टपक पदम या कि पैरों के ऊपर से निकल जाएंया कि चाट से लटके दिखा जाएं,या कि आंगन में हेमदा पाइप के पास पानी पीने आ गए होमतो क्या होगा--?




















Monday, 2 August 2021

                                    संवेदनशीलता बनाम असंवेदनशीलता----

घटना कुछ वर्ष पूर्व की है.

मुझे एक परिवार के साथ रेल के सफ़र से अपने शहर से दूसरे शहर जाना हुआ.,जो कि कुछ सामाजिक कारण से करनी थी.

जिस परिवार के साथ यात्रा पर जाना था उस परिवार से मेरा दूर का रिश्ता भी था,चूंकि मैं उस समय अकेली थी अतः मैंने उनसे कहा कि मेरा रिजरवेशन भी अपने साथ करवा लें ताकि उनके साथ मेरी यात्रा सुविधाजनक वा सुरक्षित रहेगी. दूसरी बात हम सभी एक ही कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जा रहे थे.

यात्रा पर हम कुल चार सदस्य थे मेरे अलावा उनके परिवार से तीन सदस्य थे,दो महिलाए  वा एक पुरुष सदस्य. वे तीनों आपस में बहन,भाई थे.

सुनिश्चित समय पर हम सभी स्टेशन पहुंच गए.कुछ देर में ही हम चारों अपने आरक्षित कम्पार्टमेंट के अपनी रिजर्व बर्थ पर सुनिश्चित हो बैठ गए.

परन्तु व्यवस्था में एक बात बड़ी असुविधाजनक थी कि, चार बर्थ में से तीन बर्थ जो हम तीनों महिलाओं की थीं इस कम्पार्टमेट में आरक्षित थीं बाकी एक बर्थ साथ वाले कम्पार्टमेंट में आरक्षित थी जो उन भद्र पुरुष की थी जो हमारे साथ यात्रा कर रहे थे और उन दो बहनों के भाई थे.

रेल विभाग की यह व्यवस्था उस परिवार को असुविधाजनक लग रही थी  अतः वे तीनों ही इसका तोड़ में सोचने लगे.

अचानक उन भद्र पुरुष की नजर सामने वाली नीचे की बर्थ पर टिक गयी जिस पर एक सज्जन पुरुष जो सन्यासी से लग रहे थे,आखें मूंदे भगवत भजन में लींन थे.

उन्हें देख कर तीनों की आखों में चमक फैल गयी.

तुरंत वे भद्र पुरुष और उन सज्जन के पास बैठ गए--आगे की भूमिका बनाने के लिए.

अधिक समय नहीं लिया उन भद्र पुरुष ने उन सज्जन  को अपनी समस्या से अवगत कराने में और साथ ही उन्हें अपने सुझाव से आश्वस्त करने में कि,वे उनकी बर्थ पर चले जाए जो कि बगल वाले कम्पार्टमेंट में  है.

उन भद्र पुरुष का आग्रह था कि चूंकि वे अकेले हैं तो कोइ फर्क नहीं पडेगा कि वे यहां बैठे या बगल वाले डिब्बे में चले जाए.

वे सज्जन सहज तैयार हो गए बगल वाले डिब्बे में जाने के लिए लेकिन एक शर्त के साथ--यदि बर्थ नीचे वाली होगी तो उन्हें कोइ आपत्ति नहीं है.

खैर,यह प्रकरण कुछ देर में ही अपनी समापन पर पहुंचने वाला था  जैसे ही भद्र पुरुष ने सज्जन पुरुष का सामान समेटा और उनकी चप्पलो को अपने हाथ से उठा कर उनके पैरों में पहना भी दी. 

  और आगे,आगे चल दिए उन सज्जन के सामान को लेकर,पीछे,पीछे वे सज्जन पुरुष घिसटते हुए चल दिए उन्हें,लग रहा था ये उनका सामान ना लेकर चल दे कहीं.

करीब १० मिनिट में वे भद्र पुरुष वापस आ गए और अपनी चादर उस खाली हुई बर्थ पर बड़ी सलीके से बिछा दी.

एक लम्बी सांस लेते हुए वे अपनी बहनों के पास आकर बैठ गए और तीनों सर से सर जोड़ कर धीमी आवाज में अपनी कुटिलता का राज फास कर रहे थे, बेहूदी खिलखिलाहट के साथ.

उन सज्जन को भद्रपुरुष अपनी ऊपर वाली सीट पर लगभग फेंक आए थे.जब वे ऊपर लटक गए तो क्या कर सकते थे,वे बेचारे निरीह मनुष्य?

उस समय तक मैं, उनकी तरफ करवट लिए हुए इस पूरे काण्ड की गवाह बनी  लेटी हुई थी .जैसे ही उस काण्ड का आख़िरी पन्ना मेरे सामने खुला,मैंने करवट बदल ली और आंखे मूंद ली.

अक्सर जब ऐसे वाकये हमारे सामने घटते हैं और घटते ही रहते हैं--हम आंखे मूंद लेते हैं.

कुछ प्रश्न खड़े थे मेरी मुंदी आखों के सामने---

१. हम इतने असंवेदनशील क्यों हो जाते हैं?

२, हम जीवन को किस  तराजू में तौलने लगे हैं,जिसके पलड़े ऊपर,नीचे हैं?

३.लाभ,हानि,जब अपनी हो तो इतनी  बड़ी  कैसे हो जाती है?

४. केवल एक बर्थ को पाने के लिए  औरअपनी सुविधा के लिए,अपने मन की आवाज को कितनी बार मारते हैं,हम सभी,क्यों?

५. हमारे साथ भी ऐसा कभी ना कभी घटित हो ही जाता है,तब क्या सोचा होगा हमने,कितना असहाय,तुच्छ पाया होगा अपने आप को?

और भी प्रश्न इंतजार कर रहे थे अपनी बारी की.

रेल चलने लगी थी,उसकेलोहे के पहिये आपस में रगड़ कर खटखटाने लगे थे और इंजन की सीटी तीखी आवाज में चीत्कार कर रही थी,उन तीनों की कुटिल खिलखिलाहट इन सब में गुम होती जा रही थी.