Wednesday, 22 October 2014

कुछ नुक्ते कुछ दाने चीनी के---



              1.ये छोटी-छोटी बातें हैं
                जैसे धूप मुडेरों की
                अब आयी---अब जाती है
                जैसे छांव अटारी की
                        २.मैंने अपनी राह चुनी
                          सब अपनी-अपनी चुनते हैं
                          मैंने अपना दर्द पिया
                          सब अपना-अपना पीते हैं
              ३.ये पथ तेरे हैं---
               कांटे तेरे,फूलों की बाडें तेरी
               मैंने तो पत्थर डाले हैं
               विराम-चिन्ह—घायल-स्मृतियों के
                      ४.कुछ तो यारो---बात करो
                       अपने-अपने आंगन की
                       भोर हुए—क्या चिडियां चहकीं?
                       सांझ ढले—क्या सोयी तुलसी?
             ५.तृप्ति-अतृप्ति के दो पन्नों की
               यह किताब अधूरी है---
               मुक्ति-बोध के हों हस्ताक्षर
               बस---यह बात जरूरी है
                       ६.एक निमंत्रण सपनों का
                         पडा हुआ था—ड्य़ोढी पर
                         दरवाजा--- जब उढकाया
                         खडा हुआ था---अपना सा
पु्नःश्चय:
          सभी सह-ब्लोगरों को,एवं मन के-मनके के पाठकों को प्रकाश-पर्व की मंगलकामनाओं के साथ.
प्रभु,धरा पर अपना प्रकाश-पुंज फैलाएं.


         

Monday, 20 October 2014

नुक्ता-चीनी—




पता नहीं इस शब्द का वास्तिविक अर्थ क्या है—निःसंदेह बोलने में मधुर लगता है,जैसे रुन-झुन,झन-झन---
खैर---जाने दें इन छोटी-छोटी बातों को.
कल ही लौट रही थी खटीमा से जहां’ ’बाल साहित्य’ गोष्ठी का आयोजन ’बाल कल्याण साहित्य संस्थान’ की ओर से आयोजित ’अंतराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन’ का आयोजन दिनांक १८ एवं १९ अक्टूबर २०१४ खटीमा उत्तराखंड में आयोजित किया गया.
यह मेरा सौभाग्य रहा कि हमारे वरिष्ठ ब्लोगर श्री रूप चन्द्र शास्त्री ’मयंक’ जी के आग्रह पर मैं इस सम्मान को पा सकी.
अन्यथा,कुए के मेढक की तरह मेरी लेखनी कुए की दीवारों से टकराती रहती.
अब, यह आंकलन मेरे लिये कठिन ही है—कि इस सम्मान के लिये मेरी योग्यता थी भी या नहीं.
खटीमा में ’खटीमा फाइबर्’, के प्रांगण में इस साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया.
वहां के निवास,आतिथ्य,प्रेम,स्नेह की स्मृतियां एक ऐसी धरोहर है जिसे नित ही सींचते रहना होगा.
मैं सभी महानुभावों को जो इस आयोजन से किसी भी स्तर पर जुडे थे उनके प्रति दिल से आभारी हूं व मेरा उन सभी को सादर आभार.
विशेष---हमारे आदरीणय श्री रूप चन्द्र शास्त्री ’मयंक’ जी को सादर आभार—स्नेह के साथ.
इन पंक्तियों के साथ---
                    एक निमंत्रण मेरा भी है
                    कर लेना स्वीकार इसे
                    आ जाना इससे पहले
                    सूखें----बंदनवार मेरे
                                          
मन के-मनके

                         

         

Saturday, 11 October 2014

एक अहसास—मां होने का





संसार की अनेक भाषाओं में,मां का संबोधन,करीब-करीब एक सा ही सुनाई देता है—मां,मातृ,मदर,अम्मा---
कितना नैसर्गिक सम्बोधन है,जब बच्चा जन्म लेता है,तो उसके मुंह से पहला शब्द ’मां,मां,मां-- निकलता है.संभवत,इस अक्षर से अधिकतर भाषाओं में, ’मां’ के संबोधन की शुरूआत हुई.
जब, मां शब्द का उच्चारण किया जाता है,तो उन शब्दों के स्वरों के स्पंदन से समस्त जीव-जगत में व्याप्त ’मां’ का अहसास पूरे आस्तित्व में बिखर जाता है.
’मां’, वह जो,जीवन के बीज को, अपने में समेटती है,उसे संरक्षित करती है, पोषती है,अपने पूरे आस्तित्व से, पूरी आत्मा से, पूरे भाव से, सम्पूर्ण भविष्य से और,उस जीवन को पृथ्वी पर लाने के लिये अपने आस्तित्व को दांव पर लगाती है क्योंकि यह वह अहसास है जो समस्त भावों का निचोड है.
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं—मां होने का अह्सास ही,नये जीवन के लिये एक जीवन को दांव पर रखना है. ठीक उसी तरह,यदि एक लहर टूटेगी नहीं तो,नई लहर जन्म कैसे लेगी?
यही सृष्टि है ,और सृष्टि की निरंतरता का यही,अह्सास है.
मां होने का अह्सास—जीवन-भर,मां और उसकी संतान के बीच एक डोर है,जो दोनों को बांधे रखती है.
जीवन में,परिस्थितियां, नदी में,उठती लहरों की भांति हैं, कभी,शांत तो,कभी,ज्वार-भाटों की तरह हैं. एक का सुख-दुख,दूसरे का सुख-दुख हो जाता है.
लेकिन,यह अह्सास भी ईश्वर-प्रदत्त जब तक ही है—हम प्रकृति की इस नैर्सगिकता को मनुष्यता से दूषित ना करें अपनी नकारता से.

ईश्वर ने, हमें,हर अहसास, वरदान से पूर्ण कर के दिया है,परंतु अक्सर ही हम, उसकी इस अनुकंपा को पहचान नहीं पाते हैं और एक ऐसी पूर्णता से अपूर्ण रह जाते हैं जो हमारे आस्तित्व को छिन्न-भिन्न कर देती है.
एक खूबसूरत कोशिश करते रहनी चाहिये,घर के आस-पास फैली खुशबुओं को पहचान ने की जो इस हवा में सिक्त हैं जिसे हम सांस कहते हैं.
एक-एक अहसास हमारी एक-एक आती-जाती सांस है---सांस खीच कर तो महसूस करें---जीवन का स्पन्दन झझकोर देगा,हर सांस में लगेगा कि हम---जी रहे हैं



Wednesday, 1 October 2014

मेरी नन्हीं---परी


 

                 
दूर क्षितिज सी क्यॊं हो जाती हो
                  दो तटों की दूरी है---मीलों सी
                  फैलाऊं बाहों को---छोर तलक
                  पर—पैरों में दृढ निश्चयों की कमी है?
                 तुम---सपनों सी, क्यों बन जाती हो?
                 आंख खुली---तो,पलकें खाली सी हैं
सागर का---फैला आंचल
मन करता है---मु्ट्ठी में भर लूं!
दूर क्षितिज को---बाहों में भर कर
बाहों में भर कर---तुमको छू लूं
                   मिटा---लिखी लकीरों को
                   फिर से---लिख दूं,पाती तुमको
                   पाती में शब्द नहीं—
                   मन होगा---शब्दों सा
शब्दों में भी---अर्थ नहीं
अक्श---होगा भावों का
अक्श में---जब तुम झांकोगी
तुम नहीं---मेरा चेहरा होगा
                     चेहरे को--- पढना मत
                     बस---मन को पढ लेना
                     आंखो से---मत देखना
                     छू भर लेना---आंखों से
जो अश्क---मेरी आंखों में होंगे
तुम्हारी आंखो से भी---टपकेगें
बस---यही एक इशारा है
हमारी-तुम्हारी---पहचान यही है
                    क्योंकि---तुम्हारी पोरों की गर्माहट
                    मेरे हृदय का---लहू वही है
                    बस---सत्य यही ,सत्य है
                    नियति हमारी---स्वीकार-भाव है
क्षितिज---जहां हैं,वहीं रहेंगे
मीलों की दूरी---बस दूरी है
कौन पूर्ण है---अंश कहां है?
एक अहम---तो, एक समर्पण है
                        और बस---कुछ नहीं है???



संदर्भ:   
ज मेरी बेटी सुमिता का जन्मदिन है.मैंने सुबह एक छोटे से फोन काल से उन्हें शुभकामनाएं तो दे दीं लेकिन कुछ अधूरा  सा लग रहा था.सोचा कुछ पंक्तियां ही लिख दूं.
लिखना-लिखाना अपनी मर्जी से तो नहीं हो पाता.ऐसा मेरे साथ होता है.
जब तक मन ना फूटे---तो भावों की धार बह्ती ही नहीं है.
याद है,पहले बच्चे दादा बन जाते थे---और अम्माएं ढोलक बजवाती रहती थीं,लड्डू के लिफाफे बटते थे---चार-चार लड्डू वाले.
यादें जितनी पुरानी होती जाती हैं उतनी ही उनकी महक और महकाती है.