एक निमंत्रण,बाट जोहता,ढ्योडी पर
पढ लेना उसको भी---
फूल गईं हैं,बोगनविलिया
महक उठीं, चंपे की कलियां
गुलमोहर की शाखाओं से
फूट पडे हैं, सूरज से फूल
कमरे की खिडकी से लटकी
मनीप्लांट की बेलें दो—
निकल पडीं, सूरज का थामें, आंचल
कमरे की खिडकी से दूर---
खोल दिये हैं, पुरवय्या ने, खिडकी के पट
दरवाजे भी, कुछ-कुछ, उढक गये हैं—
लौंट आईं हैं, पातें, विहगों की---
चलीं गईें थी, जो, पतझड से दूर—
छप गये, पत्र-निंमंत्रण, मनुहारों के
आतुर हैं,आंचल में भरने को( चले गये जो अपनों से दूर)
आंगन की बगियों में भी—
बिछ गये, मनुहारी, गुलमोहर के फूल
देख, पत्र-निंमंत्रण, मनुहारों के
एक बार,उन्हें भी भी पढ लेना
दरवाजे की ढ्योडी पर,नितांत कोई
बाट, जो रहा दूर तलक-----
एक मनुहार और, मान लेना मेरी भी
उनको भी ले आना साथ—
जो, छोड चले गये------
मेरे इस आंगन से दूर----
एक निमंत्रण, बाट जोहता ढ्योडी पर----
मन के--मनके