Tuesday, 28 June 2011
Monday, 27 June 2011
नील गगन में,नीलाम्बर से----
नील गगन में, नीलाम्बर से,
चहु ओर दिशा में, खिल जाओ,
उस पार तुम्हें मैं देख सकूं,
इस पार ,मुझे तुम,पा जाओ,
बादल के झुरमुट में,छुपकर,
ओझल क्यों हो जाते हो ,
मेरे हर सपने में आकर,
गीत-विरह के,क्यों बनजा ते हो,
निर्जन-मन की दग्ध-शिला पर,
कब तक भस्म करूं मैं तलुवों को,
एक तुम ही हो,इन सपनों के सौदागर,
किस राह,खडी रहूं ,आस लिए,किस आगुन्तुक की,
यह तुम भी जानो हो,पहचानो हो,
फ़िर क्यों, निर्मोही से हो जाते हो,
द्वार रखें हैं,उढ्काए से मैने,
जब भी चाहो,आजाओ-----,
आखों में,छवि तुम्हारी,
ढ्योडी पर ले आस खडी हूं,
इस आस को बेआस न करना,
बादल घिरने से पहले,दस्तक दे देना,
नील गगन में नीलाम्बर से------
मन के- मनके
चहु ओर दिशा में, खिल जाओ,
उस पार तुम्हें मैं देख सकूं,
इस पार ,मुझे तुम,पा जाओ,
बादल के झुरमुट में,छुपकर,
ओझल क्यों हो जाते हो ,
मेरे हर सपने में आकर,
गीत-विरह के,क्यों बनजा ते हो,
निर्जन-मन की दग्ध-शिला पर,
कब तक भस्म करूं मैं तलुवों को,
एक तुम ही हो,इन सपनों के सौदागर,
किस राह,खडी रहूं ,आस लिए,किस आगुन्तुक की,
यह तुम भी जानो हो,पहचानो हो,
फ़िर क्यों, निर्मोही से हो जाते हो,
द्वार रखें हैं,उढ्काए से मैने,
जब भी चाहो,आजाओ-----,
आखों में,छवि तुम्हारी,
ढ्योडी पर ले आस खडी हूं,
इस आस को बेआस न करना,
बादल घिरने से पहले,दस्तक दे देना,
नील गगन में नीलाम्बर से------
मन के- मनके
Sunday, 12 June 2011
मेरे शहर के खन्ढ्हर-----
आज़,
मेरे शहर की हर सडक पर
मुझको बुलाते है,खन्ढ्हर
जैसे कहना चाहते हों
कोई तो उठा जाए,मेरी गिरती हुई दीवार को
अफ़सोस,
घरोंदो के घ्रर हुए
घरों से रिहायशें
रेहायशों के भी खत्म हो गए
सुनसान फ़लसफ़े---------
वक्त ने किया,क्या हसीं सितम
हम रहे न हम,तुम भी कुछ न रह गए
कल सजाने की चाहतों ने
चटका दिए----बे-खबर
आज के शीश-महल
जिनकी दरारों में
खुद के चेहरे भी
बद्शक्ल हो गए
छोटी-छोटी हसरतें
क्यों बन नहीं पातीं
बीते हुए कल की धरोहरें
क्यों कोई बनाता नहीं,उन्हें एक और ताजमहल
बेशक,
इन ताजो को गढ्ने के लिए
कटे नही हजारों हाथ थे
पर,
हजारों ख्याबों-----के
बेआवाज़, कत्ल तो हो गए
देखो,
उस रिसते हुए,सुर्ख लहू की धार को
ढके हुए घाव से जो फ़ूटती ---- है
मरते दम तक,
शाहेजहां के साथ था
उसके ताज का दीदारे-जिगर
पर,
कितने शाहेजहां---------यहां
दफ़्न हो गए,बगैर दीदार के
कौन,
कहता है कि----
पैदा हुआ था,इस जहां में
एक ही,-----शाहेजहां
जिसकी ख्याबे हकीकत था,ताजमहल
एक ही,
सिकन्दर यहां पैदा हुआ था
रोंदे थे जिसने,वक्त के कदमों के निशां
बस,
चाहिए उस अह्सास की
एक ऐसी नज़र-------
जो ढूढ ले-------
राहों पर बिखरे हुए
जाने वालों के कदमों, के निशां
वक्त की आन्धी कुछ ऐसी चली
हस्तियों के पेड,जड से ही ढह गए
वक्त ने किया क्या हसीं सितम
हम रहें न हम, तुम भी कुछ न रह गये
मन के-मनके
मेरे शहर की हर सडक पर
मुझको बुलाते है,खन्ढ्हर
जैसे कहना चाहते हों
कोई तो उठा जाए,मेरी गिरती हुई दीवार को
अफ़सोस,
घरोंदो के घ्रर हुए
घरों से रिहायशें
रेहायशों के भी खत्म हो गए
सुनसान फ़लसफ़े---------
वक्त ने किया,क्या हसीं सितम
हम रहे न हम,तुम भी कुछ न रह गए
कल सजाने की चाहतों ने
चटका दिए----बे-खबर
आज के शीश-महल
जिनकी दरारों में
खुद के चेहरे भी
बद्शक्ल हो गए
छोटी-छोटी हसरतें
क्यों बन नहीं पातीं
बीते हुए कल की धरोहरें
क्यों कोई बनाता नहीं,उन्हें एक और ताजमहल
बेशक,
इन ताजो को गढ्ने के लिए
कटे नही हजारों हाथ थे
पर,
हजारों ख्याबों-----के
बेआवाज़, कत्ल तो हो गए
देखो,
उस रिसते हुए,सुर्ख लहू की धार को
ढके हुए घाव से जो फ़ूटती ---- है
मरते दम तक,
शाहेजहां के साथ था
उसके ताज का दीदारे-जिगर
पर,
कितने शाहेजहां---------यहां
दफ़्न हो गए,बगैर दीदार के
कौन,
कहता है कि----
पैदा हुआ था,इस जहां में
एक ही,-----शाहेजहां
जिसकी ख्याबे हकीकत था,ताजमहल
एक ही,
सिकन्दर यहां पैदा हुआ था
रोंदे थे जिसने,वक्त के कदमों के निशां
बस,
चाहिए उस अह्सास की
एक ऐसी नज़र-------
जो ढूढ ले-------
राहों पर बिखरे हुए
जाने वालों के कदमों, के निशां
वक्त की आन्धी कुछ ऐसी चली
हस्तियों के पेड,जड से ही ढह गए
वक्त ने किया क्या हसीं सितम
हम रहें न हम, तुम भी कुछ न रह गये
मन के-मनके
Saturday, 11 June 2011
क्या फ़र्क पडता है---
क्या फ़र्क पडता है,
तुम वहां पहुंचे
हम, रह गए यहां
कुछ देर बाद,
हम भी होगें वहां
जहां तुम पहुंचे हो
कोई बात नहीं,
गर किताबे-जिन्दगी के
हर्फ़ पढे हैं, तुमने कई
हम तो बस,
कुछ लाइनों से ही
काम चला लेगें
कभी-कभी,हमसफ़र,
साथ शुरू करते हैं,सफ़र
कोई ज़रा ठिठक कर
रह गया बीच में,
कोई सफ़र का---
सफ़रनामा लिख रहा
जिन्दगियों के,
फ़र्क-फ़र्क हलफ़्नामे हैं
कोई लिख रहा,इबारते-जिन्दगी
तो,कि्सी के नसीब में,
फ़कत आई हैं,दो लाइने
सारी उम्र पढ्ने के लिए----
’मन के-मनके
तुम वहां पहुंचे
हम, रह गए यहां
कुछ देर बाद,
हम भी होगें वहां
जहां तुम पहुंचे हो
कोई बात नहीं,
गर किताबे-जिन्दगी के
हर्फ़ पढे हैं, तुमने कई
हम तो बस,
कुछ लाइनों से ही
काम चला लेगें
कभी-कभी,हमसफ़र,
साथ शुरू करते हैं,सफ़र
कोई ज़रा ठिठक कर
रह गया बीच में,
कोई सफ़र का---
सफ़रनामा लिख रहा
जिन्दगियों के,
फ़र्क-फ़र्क हलफ़्नामे हैं
कोई लिख रहा,इबारते-जिन्दगी
तो,कि्सी के नसीब में,
फ़कत आई हैं,दो लाइने
सारी उम्र पढ्ने के लिए----
’मन के-मनके
मेरे शहर के खंडहर
आज, मेरे शहर की हर सडक पर
मुझको बुलाते हैं, खन्डहर
जैसे कहना चाहते हों,
कोई तो उठा जाए मेरी गिरती हुई दीवार को
अफ़सोस, घरोंदे के घर हुए
घरों से रिहायशे
रिहायशों के भी खत्म हो गए
सुनसान फ़लसफ़े
वक्त ने किया क्या हसीं सितम
हम रहे न हम, तुम भी कुछ न रह गये कल को सजाने की चाहतो ने चटका दिये --- बे- खबर आज के शीशमहल जिनकी दरारों में
खुद के भी चेहरे भी बद शक्ल हो गये छोटी- छोटी हसरतें क्यों, बन नहीं पाती बीते हुये कल की धरोहरे क्यों कोइ बनाता नही उन्हे एक और ताजमहल
बेशक
इन ताजो को गढने के लिये कटे नही हजारों हाथ थे पर हजारों ख्यावों के बेआवाज कत्ल तो हो गये देखो
उस रिसते हुये सुर्ख लहू की धार को जो, ढके हुए घावों से फूटती है, हर समय वक्त ने किया क्या हसी सितम हम रहे न हम , तुम - तुम न रह गये मरते दम तक
उसके ताज का दीदार
पर कितने शाहेजहां , शाहेजहां के साथ था- ए- जिगर दफ्न हो गये बगेर दीदार के वक्त की आधी कुछ ऎसी चली हस्तियों के पेड, जड से ही ढह गये वक्त ने किया क्या हसी सितम हम रहे न हम , तुम, भी कुछ न रह गये कौन कहता है
पैंदा हुआ, कि था इस जहां में एक ही शाहेजहां जिसका ख्वावे
एक ही सिकन्दर - हकीकत था, ताजमहल , यहां पैंदा हुआ था
रोदें थे जिसने वक्त के कदमो के निशा
बस, चाहिये उस अहसास की एक ऎसी नजर जो ढूढ ले
राहों पर बिखरे हुये जाने वाले के कदमो के निशां
कुछ ऎसी चली
हस्तियों के पेड
जड से ही ढह गयेवक्त की आधी वक्त ने किया, क्या हसी सितम हम रहे न हम
उमा
, तुम भी, कुछ न रह गये ,,
मुझको बुलाते हैं, खन्डहर
जैसे कहना चाहते हों,
कोई तो उठा जाए मेरी गिरती हुई दीवार को
अफ़सोस, घरोंदे के घर हुए
घरों से रिहायशे
रिहायशों के भी खत्म हो गए
सुनसान फ़लसफ़े
वक्त ने किया क्या हसीं सितम
हम रहे न हम, तुम भी कुछ न रह गये कल को सजाने की चाहतो ने चटका दिये --- बे- खबर आज के शीशमहल जिनकी दरारों में
खुद के भी चेहरे भी बद शक्ल हो गये छोटी- छोटी हसरतें क्यों, बन नहीं पाती बीते हुये कल की धरोहरे क्यों कोइ बनाता नही उन्हे एक और ताजमहल
बेशक
इन ताजो को गढने के लिये कटे नही हजारों हाथ थे पर हजारों ख्यावों के बेआवाज कत्ल तो हो गये देखो
उस रिसते हुये सुर्ख लहू की धार को जो, ढके हुए घावों से फूटती है, हर समय वक्त ने किया क्या हसी सितम हम रहे न हम , तुम - तुम न रह गये मरते दम तक
उसके ताज का दीदार
पर कितने शाहेजहां , शाहेजहां के साथ था- ए- जिगर दफ्न हो गये बगेर दीदार के वक्त की आधी कुछ ऎसी चली हस्तियों के पेड, जड से ही ढह गये वक्त ने किया क्या हसी सितम हम रहे न हम , तुम, भी कुछ न रह गये कौन कहता है
पैंदा हुआ, कि था इस जहां में एक ही शाहेजहां जिसका ख्वावे
एक ही सिकन्दर - हकीकत था, ताजमहल , यहां पैंदा हुआ था
रोदें थे जिसने वक्त के कदमो के निशा
बस, चाहिये उस अहसास की एक ऎसी नजर जो ढूढ ले
राहों पर बिखरे हुये जाने वाले के कदमो के निशां
कुछ ऎसी चली
हस्तियों के पेड
जड से ही ढह गयेवक्त की आधी वक्त ने किया, क्या हसी सितम हम रहे न हम
उमा
, तुम भी, कुछ न रह गये ,,
Friday, 3 June 2011
जीवन की किताब के एक पन्ने से----
अभी कुछ दिन पूर्व"मन के-मनके, ब्लोग पर मैने एक लेख डाला था,शीर्षक था,’जीवन चुनाव नहीं,स्वीकार्य-भाव,है.
यह लेख मैने ओशो द्वारा उनके प्रवचनों में ,उनकी कही प्रवन्चनाओं में से कुछ विचारों को चुन कर लिखा था.
ओशो,जो भी कहतें हैं,वह सत्य है,जो सत्य के दर्पण में सत्य का ही प्रितिबिम्ब है,उसकी छवि है.
मुझे,आस-पास बिखरे जीवन के पन्नों को पलटकर पढना व उन्हें समझने का प्रयत्न करना अच्छा लगता है.
अपने-आप से छिटक कर विराट दायरे में प्रवेश कर जीवन की विराटता को उसकी समग्र विभिन्नताओं को एक रूप में देखना विस्म्रित करता है.
इसी संदर्भ में--कई बार एक पात्र मेरे मानस-पटल पर आया और सोचा उस पात्र पर कुछ लिख सकूं,जूशो द्वारा कहे उक्त सत्य को जी रहा है व उस सत्य के कुछ तो करीब है.
मेम जिस शहर में रहती हूं,वह केवल भारत के नक्शे पर ही नहीं वरन सन्सार के उन महानतम नगरों मेम से प्रमुख है है जो एथासिक ध्रूऊहर के प्रतीक हैं.
वह शहर आगरा हैजो इतिहास के पन्नों में एक अभूतपूर्व प्रेम की कहानी को ताजमहल के रूपमे ं सजोए हुए है.
जिन महिला के बारे मेम लिख रही हूं वे बहुत ही साधारण महिला है,घर-घर बर्तन साफ़ करके अपना भरण-पोषण करतीहैं.उम्र ७५ वर्श से अधिक ही होगी,दिखता भी कम है,सुनाई भी कम देता है.उम्र ने कमर भी झुकाद ी है और्हाथ-पैरों में कम्पन भी रहताह ै.
पति को गुज़रे वर्शों बीत गए.दो-तीन बेटों की ग्रुहस्ती मेम जैसे-तैसे खिप रहीं है.
बडे बेटे के मरने के बाद उसकी पत्नी तीन मासूम बच्चःऒं को छोड कर चली गई.
इन सब हालातॊं के बीच उक्त महिला अपने अनाथ नाती-पोतों की देख-भल कर रही हैं.सुबह से शाम तक घर-घर जाकर काम करना,काम पर आने से पहले बच्चों के खानेकेी व्यवस्ता करके आना,दिन छिपे,घर लौटना,फिर भच्चोंके लिए अंधी आंखों से खाना बनाना.
जब भी मिलती हैं--ऊंची आवाज में कहती हैं---बहूजी,राम-राम,बाल-बच्चे सब कुशल से हैं .
मैने कभी भी उनको अपनी जिन्दगी की किताब के पन्ने पलटते नही देखा.अगर कभी किसी ने कहा-अम्मा,अब आराम करो,तो एक ही जवाब--बहूजी,चलती-फ़िरती हूं तो शरीर चल रहाहै नही तो चारपाई से लग जाऊंगी,कौन सेवा करेगा.,
न,मरने की चिन्ता,न सेवा की दरकार-----------
यही ओशो का--स्वीकार्य-भाव है.
मन के-मनके
यह लेख मैने ओशो द्वारा उनके प्रवचनों में ,उनकी कही प्रवन्चनाओं में से कुछ विचारों को चुन कर लिखा था.
ओशो,जो भी कहतें हैं,वह सत्य है,जो सत्य के दर्पण में सत्य का ही प्रितिबिम्ब है,उसकी छवि है.
मुझे,आस-पास बिखरे जीवन के पन्नों को पलटकर पढना व उन्हें समझने का प्रयत्न करना अच्छा लगता है.
अपने-आप से छिटक कर विराट दायरे में प्रवेश कर जीवन की विराटता को उसकी समग्र विभिन्नताओं को एक रूप में देखना विस्म्रित करता है.
इसी संदर्भ में--कई बार एक पात्र मेरे मानस-पटल पर आया और सोचा उस पात्र पर कुछ लिख सकूं,जूशो द्वारा कहे उक्त सत्य को जी रहा है व उस सत्य के कुछ तो करीब है.
मेम जिस शहर में रहती हूं,वह केवल भारत के नक्शे पर ही नहीं वरन सन्सार के उन महानतम नगरों मेम से प्रमुख है है जो एथासिक ध्रूऊहर के प्रतीक हैं.
वह शहर आगरा हैजो इतिहास के पन्नों में एक अभूतपूर्व प्रेम की कहानी को ताजमहल के रूपमे ं सजोए हुए है.
जिन महिला के बारे मेम लिख रही हूं वे बहुत ही साधारण महिला है,घर-घर बर्तन साफ़ करके अपना भरण-पोषण करतीहैं.उम्र ७५ वर्श से अधिक ही होगी,दिखता भी कम है,सुनाई भी कम देता है.उम्र ने कमर भी झुकाद ी है और्हाथ-पैरों में कम्पन भी रहताह ै.
पति को गुज़रे वर्शों बीत गए.दो-तीन बेटों की ग्रुहस्ती मेम जैसे-तैसे खिप रहीं है.
बडे बेटे के मरने के बाद उसकी पत्नी तीन मासूम बच्चःऒं को छोड कर चली गई.
इन सब हालातॊं के बीच उक्त महिला अपने अनाथ नाती-पोतों की देख-भल कर रही हैं.सुबह से शाम तक घर-घर जाकर काम करना,काम पर आने से पहले बच्चों के खानेकेी व्यवस्ता करके आना,दिन छिपे,घर लौटना,फिर भच्चोंके लिए अंधी आंखों से खाना बनाना.
जब भी मिलती हैं--ऊंची आवाज में कहती हैं---बहूजी,राम-राम,बाल-बच्चे सब कुशल से हैं .
मैने कभी भी उनको अपनी जिन्दगी की किताब के पन्ने पलटते नही देखा.अगर कभी किसी ने कहा-अम्मा,अब आराम करो,तो एक ही जवाब--बहूजी,चलती-फ़िरती हूं तो शरीर चल रहाहै नही तो चारपाई से लग जाऊंगी,कौन सेवा करेगा.,
न,मरने की चिन्ता,न सेवा की दरकार-----------
यही ओशो का--स्वीकार्य-भाव है.
मन के-मनके
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