मन के - मनके

Monday, 18 March 2013

तुम-----

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तुम-----        अपने-अहम के               बबूलों को                    सींचते रहे---         मेरे घर के            ग...
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Wednesday, 23 January 2013

प्रेम-ओशो की नजर में

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१.प्रेम-एक प्रतीक्षा है.   २.प्रेम-एक धन्यता है. ३.प्रेम-एक परपज है.      ४.-प्रेम-कोई शास्त्र नहीं है.          ५.प्रेम-कोई प...
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Tuesday, 15 January 2013

द्वंद-निर्द्वंद

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द्वंद-निर्द्वंद-मन-क्लांत    निर्जन सा, आत्म-गहन             जीवन-सागर की लहरें,उदंड         पटक रहीं,तट पर,मस्तक--            ...
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Sunday, 6 January 2013

कामनी का हादसा-----

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कामिनी का हादसा हमारे समाज के दोगलेपल की तस्वीर है----पोस्टेड बाय डा. अनवर जमाल---- ’किसी लडकी को आप---समाज का चलन उल्टा है सच से इस...
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Friday, 28 December 2012

आतुर हैं---भरने को ड्योढी पर मेरे

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जाते हुए वक्त को(हर रोज)पीछे छोड कर उन, असीमित--- घाटिओं के उस पार चलती रहती हूं------- कल के सिंदूरी-सूरज का, थामने हाथ   ...
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मन के - मनके
मेरा परिचय तो,अभी अभी ही बना है-’मन के- मनके’के माध्यम से!फिर भी,औपचारिता निभाते हुए-इस ’परिचय’को श्ब्दों में गूंथने की कोशिश कर रही हूं!इंन्सान का’मन’ऎसी गीली मिट्टी की नाई होता है,जंहा’अनुभूतियों’के बीज गिरते रहते है,पल्लवित होने के लिए!इसके लिए’सम्भावनाओं’की बयार बहने की देरी है और’महक’उठती ही है-चारो ओर फैलेगी ही!यह कहना कठिन है-मेरी’अभिव्यक्तियां’किस महक को लेकर हवा मे फैल रही हैं!मै,जीवन को सबसे बडी और अहम पाठशाला मानती हुं सो उसमें मेरा प्रवेश जारी है!औपचारिक डिग्रियां कागजी आवराण में सिमट कर एक फाइल में रखी हुई हैं!ग्रहस्त जीवन की उपलब्धियां पूर्ण हैं कुह नाकामियों के साथ!मै,भाग्यशाली हूं -जब आखें मूंदती हूं तो’नानी जी’’आम्मा जी’के सम्बोधन,की स्वर-लहरी कानों को झंकारित कर देती है हर जीवन मे एक’खालीपन’होता ही है सो वह (खालीपन)रंग भी जीवन के कैनवास पर चढ़ चुका है!अब एक कोशिश मे जुट गई हूं-कुछ नये रंग खोज रही हूं जिन्हे उस कैनवास मे भर सकूं!ईश्वर को धन्यवाद देती हूं कि उसकी अनुकम्पा से मुझे यह अवसर मिला!अब,कुछ अनुभूतियों शेष हैं या यूं कहें कि अभी भी कुछ’अनुभूतियों’ मन की गीली मिट्टी पर फूट रही है- जो अभिव्यक्ती चाहती हैं साथ ही आप सभी की ओर दो शब्द- ’वाह-वाह’ के मन के - मनके (डा० उर्मिला सिंह)
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